दोहे – मन्जिल
ठोकर खाकर भी उठा, हार न थी मंजूरतेज भाग कर मिल गयी, मंजिल जो थी दूर एक पैर जब कट
Read Moreठोकर खाकर भी उठा, हार न थी मंजूरतेज भाग कर मिल गयी, मंजिल जो थी दूर एक पैर जब कट
Read Moreप्यासे को पानी मिला अधरों की मुस्कान।बस इतनी सी चाहत लिए फिरें इंसान।।गांवों में अब है कहां, हरियाली की आस।सांसों
Read Moreआज तुम्हारे ढोल से, गूँज रहा आकाश।बदलेगी सरकार कल, होगा पर्दाफाश॥ छुपकर बैठे भेड़िये, लगा रहे हैं दाँव।बच पाए कैसे
Read Moreपैदा क्यों होते नहीं, भगत सिंह से वीर,माटी अब भी पूछती, कब जागेगी पीर? स्वप्न सिसकते रह गए, कहाँ गई
Read Moreभगत सिंह, सुखदेव क्यों, खो बैठे पहचान।पूछ रही माँ भारती, तुम से हिंदुस्तान।। भगत सिंह, आज़ाद ने, फूंका था शंख
Read Moreनूतन सूर्य उजास में, मत छोड़ो तुम आस। सतगुरु चरनन सौंप सब, करो नवीन प्रयास।। इसका उसका कुछ नहीं, सब
Read More