कविता

फिर भी हिंदुस्तान है आजाद

आज भी नहीं सुधरे हैं आम जनता के हालात फिर भी कहते हैं हिंदुस्तान है आजाद घुम रहे हैं सड़कों पर नवयुवक बेरोजगार भूखे रो रहा देश का भावि कर्णधार उड़ सकते हैं वे भी नहीं कोई पंख लगानेवाला मंजील तो पता है नहीं कोई राह दिखानेवाला अज्ञानता के भंवर में डूबा है समाज फिर […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 8

कुछ अरसा बाद गढ़ी कपूरा में भाई श्रीराम (बहन गोरज के पति) का कोई खास काम भी न था। बहन गोरज ने फैसला किया मरदान जाते हैं। एक तो बहनजी को सहारा मिल जायेगा, दूसरा काम शायद कुछ अच्छा हो जाए। इस तरह भाई श्रीराम और गोरज भी मरदान आ गए और एक ही मकान […]

गीतिका/ग़ज़ल

लोगों के डर से………

  लोगों के डर से मुझ से तुम चले, दूर जाते हो पास आने के लिए फिर हो,मजबूर जाते हो यूँ तो तेरे ख्वाब में ,तेरे ख्यालों में ही रहता हूँ जहाँ मिले थे पहली बार, वहाँ जरूर जाते हो नरम बालू सा धूल सा बिछा रहा तेरे कदमों तले न जाने क्यों फिर भी […]