Monthly Archives: July 2018


  •  “गज़ल”

     “गज़ल”

    वज़्न- 221 1222 221 1222, काफ़िया- अ, रदीफ़ आओगे आकाश उठाकर तुम जब वापस आओगे अनुमान लगा लो रुक फिर से पछताओगे हर जगह नहीं मिलती मदिरालय की महफिल ख़्वाहिश के जनाजे को तकते रह जाओगे॥...

  • “छंद, रोला मुक्तक”

    “छंद, रोला मुक्तक”

    पहली-पहली रात, निकट बैठे जब साजन। घूँघट था अंजान, नैन का कोरा आँजन। वाणी बहकी जाय, होठ बेचैन हो गए- मिली पास को आस, पलंग बिराजे राजन।।-1 खूब हुई बरसात, छमा छम बूँदा बाँदी छलक गए...