धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर का ध्यान करने से दुःखों की निवृत्ति होती है

वेद और योग-दर्शन सभी मनुष्यों को ईश्वर का ज्ञान कराकर उन्हें ईश्वर की उपासना का सन्देश देते हैं। ईश्वर का ज्ञान व ध्यान करना क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर है कि मनुष्य को सृष्टि में विद्यमान सभी सत्तावान पदार्थों का ज्ञान होने से हानि कुछ नहीं अपितु उनसे लाभ होता है। हम स्वदेशी गाय के […]

गीतिका/ग़ज़ल

 “गज़ल”

वज़्न- 221 1222 221 1222, काफ़िया- अ, रदीफ़ आओगे आकाश उठाकर तुम जब वापस आओगे अनुमान लगा लो रुक फिर से पछताओगे हर जगह नहीं मिलती मदिरालय की महफिल ख़्वाहिश के जनाजे को तकते रह जाओगे॥ पदचाप नहीं सुनता अंबर हर सितारों का जो टूट गए नभ से उन परत खिलाओगे॥ इक बात सभी कहते […]

मुक्तक/दोहा

“छंद, रोला मुक्तक”

पहली-पहली रात, निकट बैठे जब साजन। घूँघट था अंजान, नैन का कोरा आँजन। वाणी बहकी जाय, होठ बेचैन हो गए- मिली पास को आस, पलंग बिराजे राजन।।-1 खूब हुई बरसात, छमा छम बूँदा बाँदी छलक गए तालाब, लहर बिछा गई चाँदी सावन झूला मोर, झुलाने आए सैंया ननदी करें किलोल, सिखाएं सासू दादी।।-2 महातम मिश्र […]

राजनीति

पिछली सरकारों में केवल अपराध और अराजकता का किया गया भारी निवेश

वर्तमान समय में प्रदेश की राजनीति में विपक्षी दलों की ओर से महागठबंधन बनने के बाद अब इन सभी दलों के नेता प्रदेश की भाजपा सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को पूरी तरह से नाकाम बताने के लिए पूरी तरह से अपनी ताकत और बुद्धि लगा रहे हंै। यह प्रदेश की जनता अच्छी तरह […]

गीत/नवगीत

” करता सावन है ईशारे ” !!

बदले बदले हैं नज़ारे ! करता सावन है इशारे !! अब न बादल की गरज है , अब न बिजली की कड़क है ! तरबतर है अभी सब तो , मीठी मीठी सी धड़क है ! गीत होठों पे सजे हैं , कोई मितवा को पुकारे !! सजी देखो ये धरा है , रूप कानन […]

गीतिका/ग़ज़ल

सच्चाई रख सीने में ठोकर पे दुनियादारी रख

सच्चाई रख सीने में ठोकर पे दुनियादारी रख ग़र जीने की चाहत है तो मरने की तैयारी रख तूफ़ां से घबराने वाले पार नही उतरा करते तूफ़ानों से ठकराने में सबसे पहली बारी रख सीधा साधा होने का मतलब नाकामी पाएगा बेहद लाजिम है तू चेहरे में थोड़ी ऐयारी रख देख ज़रूरी है जैसे को […]

गीतिका/ग़ज़ल

दबे हर दर्द को ऐसे बढ़ाया जा रहा है

दबे हर दर्द को ऐसे बढ़ाया जा रहा है नमक हर घाव पर मलकर लगाया जा रहा है सिंचाई हो रही है आदमी के खून से अब धरा को प्यार की बंजर बनाया जा रहा है नही है असलियत में दूर तक जिसका निशां भी हमें झूठा वही मंजर दिखाया जा रहा है लगाई आग […]

सामाजिक

लेख– देश की अर्थव्यवस्था को बट्टा लगाते, बढ़ते आंदोलन

एक लोकतांत्रिक देश की अर्थव्यवस्था किसके पैसों पर चलती है। यह बताने की बात नहीं। आम अवाम टैक्स अदा करती है, फ़िर उसी पैसों से देश चलता है। ऐसे में जब अवाम के पैसों से ही देश की गाड़ी गतिमान होती है। फ़िर एक बात यह समझ नहीं आती, कि हिंसा और विरोध प्रदर्शन के […]

गीतिका/ग़ज़ल

माली गर गुलशन के सैयाद नही होते

माली गर गुलशन के सैयाद नही होते सदियों के रिश्ते यूँ बर्बाद नही होते तब तक आजादी के होने के माने क्या जब तक कट्टरता से आजाद नही होते हमने यदि धर्मों को समझा होता तो फिर धर्मों के नाम कभी उन्माद नही होते जिनके मन मैं सच का उजियारा रहता है उनके मन में […]

गीतिका/ग़ज़ल

तीरगी दिल से मिटाना चाहता हूँ

तीरगी दिल से मिटाना चाहता हूँ दीप आशा के जलाना चाहता हूँ रूठकर मुझसे हुए जो दूर मेरे पास फिर उनको बुलाना चाहता हूँ प्यार जब तक है तभी तक ज़िन्दगी है मैं जहां को ये बताना चाहता हूँ जानता मैं बहुत मुश्किल है लेकिन आदमी ख़ुद को बनाना चाहता हूँ पोंछकर आँसू किसी की […]