उल्लू

बात मुंबई एयरपोर्ट की है. एयरक्राफ्ट के कॉकपिट में अचानक से एक ग्रे कलर का उल्लू उड़कर आया और कमांडर की बाईं तरफ की सीट के बगल में आकर बैठ गया. ग्राउंड स्टाफ ने काफी मशक्कत के बाद उल्लू को वहां से हटाया जा सका. हमने सोचा, आज उल्लू से ही बात कर ली जाए. उसे तनिक सांस लेने की मुअल्लत देकर हमने अपना पहला प्रश्न उछाला- ”उल्लू भाई, कैसे हैं आप?”
पता नहीं क्यों उल्लू से कुछ बोला नहीं गया, उसके झर-झर आंसू निकलने लगे. हमें दुःख भी लगा, कि पता नहीं हमने कुछ गलत तो नहीं कह दिया, तभी उल्लू ने अपनी चुप्पी तोड़ी- ”आप बिलकुल चिंता न करें मैडम तिवानी, ये दुःख के नहीं खुशी के आंसू हैं. असल में आज किसी ने मुझे भाई के संबोधन से पुकारा है, अन्यथा मैं तो यही सुनता आ रहा था- ”तुम तो निरे उल्लू हो.” ”काठ के उल्लू, तुम्हें अक्ल कब आएगी?” आदि-आदि.
”आपको कैसे पता चला, कि मैं मैडम तिवानी हूं?” मेरी जिज्ञासा स्वाभाविक थी.
”लीजिए, 1983 का बसंत ऋतु का वह खूबसूरत दिन मुझे अच्छी तरह याद है, जब मैं बसंती फूलों का नजारा लेते हुए आपके स्कूल के एक पेड़ पर आ गया था, आपने मुझे देखकर न हल्ला-गुल्ला मचाया, न मुझे उड़ाने की कोशिश की, आप झट से अपनी कला अध्यापिकाओं मिसेज विपिन हाँडा और ज्योति सुमन को बुला लाईं और मेरे खूबसूरत स्केच बनवाए. मुझे यह भी याद है, कि जो भी मुझे देखने आता था, उसे आप इशारे से बता रही थीं, कि होली-होली जाना, शोर न मचाना.”
”उड़ाने से मुझे याद आया, आप जेट एयरवेज के एक विमान के कॉकपिट में कैसे चले गए थे?”
”बहुत समय से मेरा भी एक सपना था, कि विमान की सैर करूं, पर आप लोग तो विमान में मुझे जाने नहीं देते, इसलिए मैं कॉकपिट में जाकर बैठ गया था. जब तक पाइलेट स्टॉफ आया, मैंने अपने सपने को अंजाम दे दिया.”
”अच्छा अपने बारे में कुछ और बताओ.”
”मैं रात्रिचारी पक्षी हूं. मुझे दिन की अपेक्षा रात में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है. मेरे कान बेहद संवेदनशील होते हैं. रात में जब मेरा कोई शिकार (जानवर) थोड़ी-सी भी हरकत करता है, तो मुझे पता चल जाता है और मैं उसे दबोच लेता हूं. मेरे पैरों में टेढ़े नाखूनों-वाली चार-चार अंगुलियां होती हैं, जिससे मुझे शिकार को दबोचने में विशेष सुविधा मिलती है. चूहे मेरा विशेष भोजन हैं. उल्लू लगभग संसार के सभी भागों में पाया जाता है.”
”आपकी कितनी प्रजातियां हैं?”
”उल्लू छोटे और बड़े दोनों तरह के होते हैं और इनकी कई जातियाँ भारत वर्ष में पाई जाती हैं. बड़े उल्लुओं को दो मुख्य जातियाँ मुआ और घुग्घू है. मुआ पानी के क़रीब और घुग्घू पुराने खंडहरों और पेड़ों पर रहते हैं.”
”हमने सुना है कि उल्लू बनाने का अर्थ है मूर्ख बनाना, पर बहुत-से लोग उल्लू को बुद्धिमान मानते हैं.”
”अपनी-अपनी समझ है. अपना उल्लू सीधा करने के लिए कुछ तो लोग कहेंगे ही. बड़ी आंखें बुद्धिमान व्यक्ति की निशानी होती है. मेरी आंखें भी बड़ी होती हैं, इसलिए उल्लू को बुद्धिमान माना जाता है, हालांकि ऐसा जरूरी नहीं है पर ऐसा विश्वास है. यह विश्वास इस कारण है, क्योंकि कुछ देशों में प्रचलित पौराणिक कहानियों में उल्लू को बुद्धिमान माना गया है. प्राचीन यूनानियों में बुद्धि की देवी, एथेन के बारे में कहा जाता है कि वह उल्लू का रूप धारकर पृथ्वी पर आई हैं. भारतीय पौराणिक कहानियों में भी यह उल्लेख मिलता है कि उल्लू धन की देवी लक्ष्मी का वाहन है और इसलिए वह मूर्ख नहीं हो सकता है. हिन्दू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है. वैज्ञानिकों का दावा है कि उल्लुओं में सुपर ट्यून बुद्धि होती है, जो उनके लिए मददगार होती है.”
”कुछ लोग उल्लू से डरते भी हैं?” मैंने पूछा.
” जी हां, डरावने दिखने के कारण कुछ लोग उल्लू से डरते भी हैं.” उल्लू ने बेबाकी से कहा.
”दिवाली और उल्लू की बलि का कनेक्शन हैरान भी करता है और परेशान भी.”
”अब लोगों के अधविश्वासों का क्या कहें? कुछ लोग तो दिवाली पर लक्ष्मी पूजा करने के बाद लक्ष्मी की आरती भी नहीं करते. क्योंकि आरती के बाद मां चली जाएंगी. ये तो सामान्य लोगों की बातें हैं. जो सामान्य लोग सोच भी नहीं पाते. इस दिन भी लोग एक जीव की बलि देते हैं. वो हैं हम बेचारे उल्लू. अपना उल्लू सीधा करने के लिए लोगों को उल्लू बनाना भी कोई इनसे सीखे.”
”आपका कोई जन्मजात दुश्मन भी है?”
”अब कहना तो नहीं चाहिए, पर यह बात सच है, कि कौआ मेरा जन्मजात दुश्मन है. हम दोनों एक दूसरे को देखते ही बगैर कुछ किए लड़ने पर उतारू हो जाते हैं और अंत तक लड़ते ही रहते हैं.”
”आपकी बड़ी आंखें आपकी कैसे मदद करती हैं?”
”हमारी बड़ी आंखें हमको अत्यधिक दूरी से ही शिकार देखने की अनुमति देती हैं. इसके अलावा मैं आपको अपनी कुछ विशेष बातें बताता हूं.
मेरे पंख बहुत कोमल होते हैं, इसलिए हम उड़ने में बहुत कम आवाज करते हैं.
पक्षियों में केवल उल्लू ही नीले रंग को पहचान सकता है.
हमारी दृष्टि इतनी पैनी होती है, कि पक्षियों में केवल हम ही किसी वस्तु को 3 डी एंगल से देख सकते हैं.
हमारे दांत नहीं होते, हम शिकार को चबाकर नहीं खाते, बल्कि निगल जाते हैं.
सबसे ख़ास बात- हमारे गुट को संसद कहते हैं यानी अनेक उल्लू एक जगह इकट्ठे हो जाएं, तो इस ख़ास मौके को संसद कहते हैं, लेकिन आप लोग जिसे संसद कहते हैं उससे इसका कोई ताल्लुक नहीं है.” मैं उसकी बुद्धिमानी पर हैरान थी.
”अच्छा उल्लू भाई, अब आप आराम करिए, आप बहुत थक गए होंगे.”
”ओ.के. थैंक्यू मैडम जी.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।