कविता

कुछ तो जबाब दो

जब बस्तियों में आग सुलग रही थी तो तुम क्या सोच कर प्रेम- कविताएं लिख रहे थे। जब हवाएं गर्म लू लेकर बह रही थीं तो तुम क्या सोच कर दुआ दुआ बांच रहे थे । क्या तुम्हारे दुआ-दुआ बांटने से ये लू भरी हवाएं एकदम शीतल हो जाएंगी या सुलगती बस्तियां तुम्हारी प्रेम-कविताओं से […]

कविता

लड़कियां

धान की पनीरी की तरह पहले बीजी जाती हैं लड़कियां थोड़ा सा कद बढ़ जाये थोड़ा सा रंग निखर आये तो उखाड़ कर दूसरी जगह रोप दी जाती हैं लड़कियां कभी खेत बंजर तो कभी उर्वर आते हैं हिस्से परन्तु फिर भी जड़ें पकड़ ही लेती हैं जमीन को अपना लेती हैं खुशी से पानी […]

कहानी

कहानी – पहला प्यार

रमेश फेसबुक देख रहा था तो किसी के अकाउंट यानी टाइमलाइन पर यह शेर पढ़ा -” समुद्र के किनारे आबादी नहीं होती जिससे प्यार हो उससे शादी नहीं होती ।”बार-बार ये पंक्तियां उसके जहन में दस्तक देने लगीं तो पूरा शेर याद सा हो गया  । और सोचने के लिए विवश करने लगा । सागर […]

कविता

हाशिए पर खड़ा आदमी ….( कविता )

हाशिए पर खड़ा आदमी धूप मे झुलस जाता है मूक होकर क्योंकि यह सूरज के खिलाफ विद्रोह करना नहीं जानता यह हवा के खिलाफ बगावत नहीं करना चाहता क्योंकि इसे हवा का न तो रुख भांपना आता है और न ही हवा के साथ-साथ चलना हाशिए पर खड़ा आदमी इतना भोला है कि आज भी […]

कविता

कौन जाने …..(कविता)

यह बस्तियों की गोद में बैठे दुबके हुए सन्नाटे कब उठेंगे कौन जाने … दमघोटू हवा के भीतर कब तक आदमी यूं ही घुट घुट कर जिएगा कौन जाने … इस भीषण त्रासदी को लिखने के लिए कितने हाथ शेष बचेंगे कौन जाने … गंतव्य की ओर रुकी हुई आदमी की पद चाप कब फिर […]

कुण्डली/छंद

तीन छंद

1 पेट में संभालती लहू से है पालती ,इसकी आशीष से यह धरा मुस्काती है । सृजन की बेल यह दीए में यूं तेल, यह ,इसके आलोक में यह धरा उज्जियाती आती है ।। जीवन में रंग देती जीने के यह ढंग देती, जीवन की धरती को प्रेम से महकाती है । इसके बिना शिव […]

कविता

जिस दिन

जिस दिन बाड़ , खेत को खाना छोड़ देगी , उस दिन हरेक आंगन मेँ सोने की चिड़िया चहचहाएगी । जिस दिन जनता अपनी पीठ थोड़ी वक्र कर लेगी, उस दिन, कोई भी छुटभैया, उसकी पीठ पर नारे नहीँ लाद पाएगा । जिस दिन नदिया जान जाएगी कि सागर से मिलकर उसका पानी खारा हो […]

गीतिका/ग़ज़ल

कविता – शब्दों की शक्ति

खंजर जैसे पैने लफ़्ज न रखना अपने कोष में न जाने कब चल जाएँ ये नासमझी व जोश में बरसों के रिश्तों को ये इक पल में काट के रख देंगे और खींच ले जायेंगे बर्बादी के आगोश में शब्दों का तिलिस्म है सारा गीता और कुरआन में सूत्रधार थे शब्द यही महाभारत के रणघोष […]

कहानी

कहानी – मिस कॉल

रात के दस बज गए थे। दिसंबर की ठंडी रात पहाड़ों में लोग इतनी देर तक नहीं जागते खासकर गांवों में दिन भर की मेहनत मजदूरी के बाद थक कर जल्दी सोने की आदत अक्सर हर घर में देखी जा सकती है ।  गांव में दस-बारह  घर थे । पहाड़ के टीले का यह गांव […]

हास्य व्यंग्य

आलेख ….हालात ए हाजरा कहो या मंजरकशी…….

यहां लॉक डॉन क्या लगा पूरा लोक ही सन्नाटों से भर आया है । लोक की सारी भागदौड़ सिमट सी गई है सब कुछ रुका रुका थमा थमा ।आदमी घरों के अंदर इस तरह कैद है मानो पिंजरे में पंछी । और परिंदे फिर पेड़ों पर चहचहाने लगे हैं। कुछ जानवर तो जंगल छोड़कर बस्तियों […]