कविता
सोचता हूं… पश्चिमी सभ्यता की दहलीज पर बैठा हुआ पूर्व का यह आदमी भीतर जो कभी भरा पूरा हुआ करता
Read Moreफूल खिला खिलकर झर गयाइसका मतलब यह नहीं किपौधा मर गया। पौधे !तू फूल गिरने परअफसोस मत करकौन किसके साथ
Read Moreदिसंबर का महीना घोर सर्दियों के दिन।मैं कमरे में बैठा हीटर सेंक रहा था और टीवी पर समाचार देख रहा
Read More“नयनों के तले कल्पनाओं का विशाल आकाश है जिसमें मन रूपी पाखी निरंतर विचरण करता रहता है और पल प्रतिपल
Read Moreसुरजीत एक हफ्ते की छुट्टी काटकर वापस ड्यूटी पर जा रहा था। सुबह आठ बजे घर से चला था और
Read Moreपहाड़ों में जीने के लिए पहाड़ होना पड़ता है। जिस तरह पहाड़ धूप- छांव को सहते हुए हमेशा अपनी पीठ
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