कहानी

कहानी – उसके इंतजार में

जुलाई का महीना था दिन के लगभग बारह बजे होंगे। आज मौसम साफ था इसलिए बड़ी तेज धूप थी। वरना पहाड़ों में बादल हों तो जुलाई महीने में गर्मी थोड़ी कम हो जाती है। बाहर किसी ने आवाज़ लगाई। बाहर जाकर देखा तो आंगन में कंधे पर झोला उठाए और हाथ में जूतों को गांठने का औजार लिए एक व्यक्ति खड़ा था। मुझे देखकर वह मेरी तरफ मुखातिब होकर जूते गांठने के लिए कह रहा था। बोला-“साहब जूते पोलिश करवा लो। फटे हैं तो ठीक करवा लो।”
मैंने कहा-” रुको, पूछ लेता हूं। “
मैंने पत्नी को आवाज दी। “आप बोल रहे थे चप्पल टूटी है, जूते गांठने वाला आया है ठीक करवा लो।” वह शू रैक में से चप्पलों को ढूंढने लग पड़ी। मैंने कहा-” भाई साहब रुक जाओ इधर बैठ जाओ।”
बोला- “नहीं मैं अगले घर में बोल लेता हूं आप जूते लेकर आ जाओ।” उसने अगले घर में आवाज लगाई और वहां से औरतें कुछ जूते निकाल कर ले आईं। वह धूप में ही जूते गांठने बैठ गया। इधर मेरी घरवाली भी अपनी चप्पलों के जोड़े उठाकर पहुंच गई थी। उसे धूप में बैठते देखकर मैंने कहा-” भाई साहब आप इधर आ जाओ बरामदे में यहां बैठो। आंगन में बहुत तेज धूप है।” और मैं उसको बैठने के लिए अंदर से मैट ले आया।
वह औरतों के साथ जूते गांठने का मोलभाव कर रहा था।वह बता रहा था इसके सौ रुपए लगेंगे, इसके पचास रुपये लगेंगे, और इसके स्तर रुपए लगेंगे। लेकिन मोलभाव करने में औरतें भी कहां कम होती हैं वे भी अपने हिसाब से उसे किस जोड़ के कितने पैसे देंगीं मोल भाव कर रही थीं। औरतों की बात मानकर वह बेचारा चुपचाप फिर जूते गांठने में लग गया।
मैं भी उसके बगल में बरामदे में बैठकर उससे बातचीत करने लगा। धीरे-धीरे वह भी मेरे साथ खुलकर बातचीत करने लगा। उम्र होगी कोई पचास के आसपास। सिर पर घने सफेद बाल बड़ी बड़ी सफेद मूंछे और सफेद दाढ़ी। अच्छे कपड़े पहने हुए थे पेंट कमीज और चमड़े के जूते। बातूनी बहुत था। एक साथ ही वह कई विषयों पर कई बातें किए जा रहा था। औरतें भी खड़ी खड़ी बड़े ध्यान से उसकी बातें सुन रही थीं। और हम दोनों बातें किए जा रहे थे।
बात को आगे कैसे खींचा जा सकता है शायद उसके पास यह हुनर था। मैंने उसे तोलने के लिए कई विषयों में उलझाया परंतु वह हर विषय पर बेबाक अपनी राय देता रहा। ऐसा लगता था जैसे उसे हर विषय का अच्छा खासा ज्ञान हो। बातों ही बातों में उसने बताया “मैंने एक साल फौज की नौकरी भी की। वहां भी मैं मोची भर्ती हो गया था परंतु साल के बाद नौकरी छोड़कर घर भाग आया। तब मैं उन्नीस बीस साल का लड़का था। वहां से भागने का कोई बड़ा कारण नहीं था। बस साहब ने थोड़ा सा डांट दिया और मुझ में बचपना था भाग आया। फिर मुझे ढूंढते हुए आर्मी वाले घर तक आए परंतु मैंने नौकरी नहीं करने के लिए लिख कर दे दिया। वह जीवन की मेरी सबसे बड़ी गलती थी। आज भी मैं उस गलती के लिए पछताता हूं। यदि मैं यह गलती नहीं करता तो आज मैं आराम से नौकरी कर रहा होता । यूं दरवाजे- दरवाजे पर जाकर जूते नहीं गांठता। पर साहब लकीरों में जो लिखा होता है उसे कौन टाल सकता है?”
अब उसकी बातों में थोड़ी भावुकता आ गई थी। मैं थोड़ी देर चुप हो गया। वह फिर बोला- “साहब उसके बाद शहर में मैंने कुछ समय ऑटो चलाया पर उसमें भी मन नहीं लगा। इसी दौरान शादी हो गई और फिर गांव आ गया। फिर उसके बाद न जाने कहां-कहां भटका दो-चार साल। मगर कहीं ठिकाना न लगा। कभी गांव से सब्जी खरीद कर शहर में बेचता, कभी शहर से कोई सामान लाकर गांव में बेचता। कभी दो-चार महीने के लिए ड्राइवर बन जाता लोगों की गाड़ियां चला लेता। था तो मैं फितरती। आराम से बैठने वाला नहीं था।”
फिर वह मंद मंद मुस्कुरा दिया। घनी मूंछों के बीच की यह मुस्कान बड़ी खूबसूरत लग रही थी। वह फिर बोला- “लेकिन सच पूछो साहब कहीं भी ठिकाना नहीं लगा। तब तक बच्चे हो गए थे। पहले लड़की और उसके बाद लड़का। अब तो खर्चा भी बढ़ गया था। बच्चे बड़े होने लगे थे और मुझे चिंता। फिर मैं गांव छोड़कर पास के शहर में आ गया वहां अपना यही काम करने लगा।
कुछ समय बाद बच्चे भी शहर ले आया। बच्चे यहां स्कूल में पढ़ने लगे। समय पंख लगाकर उड़ने लगा और पता ही नहीं चला कब बच्चे बड़े हो गए। फिर एक दिन मैं फिर बेघर हो गया। जहां मैं दुकान लेकर मोची का काम करता था वहां सड़क चौड़ी हो रही थी और वह दुकान तोड़ दी गईं। अच्छा काम चल रहा था दिहाड़ी लग जाती थी। दो टाइम रोटी मिल जाती थी बच्चे पढ़ रहे थे। परंतु इन माथे की लकीरों ने एक बार फिर दगा दे दिया। और मैं फिर सड़क पर आ गया।
खैर समय ने करवट बदली फिर मुझे एक छोटा सा खोखा मिल गया और मैंने अपना सामान वहां रखकर फिर काम शुरू कर दिया परंतु अब पहले वाला काम नहीं था बड़ी मुश्किल से रोटी तैयार होती थी। लड़की जवान हो गई थी । रिश्ते आने लगे थे, उसने 12वीं कर ली थी और हमारे समुदाय में थोड़ा छोटी उम्र में ही शादी भी कर देते हैं।
घरवालों और रिश्तेदारों के दबाव में आकर एक अच्छा लड़का देखकर हमने उसकी शादी कर दी। वह अपने घर में बहुत सुखी है। अब तो उसके गुड़िया भी हो गई है। खाता- पीता हंसता- खेलता परिवार है। मैं लड़की की तरफ से तो पूरा बेफिक्र हूं ,बहुत अच्छा परिवार मिला है।” वह एक ही सांस में सब कुछ कह गया।
अब तक उसने दिए हुए सारे जूते गांठ दिए थे बस मेरी धर्मपत्नी ने जो दिए थे वही बचे थे। अपने अपने जूते लेकर औरतें तो चली गईं थीं। अब हम दोनों ही बातें कर रहे थे। धीरे-धीरे आंगन में धूप और भी तेज हो रही थी। उसने मेरे आंगन के सामने दिखते पहाड़ की तरफ इशारा करके कहा-“साहब सामने वाले इस पहाड़ के सभी गांवों में मैं होकर आया हूं। “
मुझे हैरानी हुई।आधी उम्र मैंने यहीं निकाल दी। सुबह आंख खुलते ही ये सामने के पहाड़ देखता हूं, परंतु कभी वहां तक गया नहीं। और यह आदमी राजस्थान से आकर एक-एक गांव में होकर आया है। एक-एक घर से परिचित है। मुझे खुद पर अफसोस हुआ कि मैं इतना पास रहकर भी कितना दूर रहा। अब मैं मन में सोच रहा था कि जरूर किसी दिन इन गांवों की तरफ घूम कर आऊंगा। आदमी भी कितना खुदगर्ज है जरूरत हो तो दूरी को भी समीपता में बदल लेता है और जरूरत न हो तो समीपता को भी दूरी में बदल देता है। यह आदमी का नैसर्गिक स्वभाव है स्वार्थ।
पहाड़ के इन गांवों में जाने के लिए मेरा कोई स्वार्थ नहीं था, कोई जरूरत नहीं थी, शायद इसलिए मैं वहां नहीं गया। और इसका स्वार्थ था रोटी कमाना, इसलिए यह इतने ऊंचे ऊंचे पहाड़ों तक घूम आया। पेट को अपने इस झोले में डालकर पगडंडिया नाप आया। मेरे मन ने धीरे से मन ही मन हामी में हुंकार भरी।

मैंने उसे फिर पूछा-“आप यहां कब से रह रहे हो ?” तब वह बोला- “साहब मैं पिछले दस महीनों से आपके इसी कस्बे में रह रहा हूं। मैं अकेला नहीं हूं मेरे साथ मेरा लड़का भी है। वह भी गांव में फेरी लगाता है। कभी रेडीमेड कपड़े बेच लेता है कभी-कभी जूते चप्पल तो कभी कोई दूसरा सामान । हम दोनों बाप बेटा गांवों में दिनभर इधर-उधर घूम कर शाम को इकट्ठा हो जाते हैं।”
तब मैंने पूछा-” आपकी वाइफ घर में रहती है क्या? आप दोनों यहां चले आए हो तो उनको भी साथ ले आते, सारा परिवार एक जगह ही रहता।”
तब वह बहुत भावुक हो गया। बोला-” साहब हमारे घर में हम ही दो हैं। मेरी वाइफ एक साल पहले इस दुनिया से चली गई है। वह मेरी पत्नी ही नहीं मेरी बहुत अच्छी दोस्त भी थी।”
मैंने बोला-” ओह यह तो बहुत बुरा हुआ। यह कैसे हुआ अभी तो छोटी उम्र होगी।”
वह बोला-“जी उम्र तो छोटी थी। हमारे यहां छोटी उम्र में ही शादी हो जाती है मेरे से दस साल छोटी थी। पर क्या करें साहब उसकी मर्जी के आगे किसकी मर्जी चलती है ,और फिर ये माथे की लकीरें कहां साथ छोड़ती हैं।”
मैंने बोला- “क्या वह बीमार थे ?”
बोला-” नहीं हम बाइक पर बेटी के गांव बेटी के पास जा रहे थे। रास्ते में सड़क थोड़ा खराब थी गांव की सड़क थी बीच में गड्ढे थे , गढ्ढों की वजह से बाइक स्किट हो गई और वह बाइक से गिर गई। मैं बाइक खड़ी करके उसे उठाने लगा तो उसके सिर में चोट लगी थी। खून तो नहीं बहा था लेकिन वह बेहोश हो गई थी। मैंने बहुत कोशिश की उसको हिलाया डुलाया परंतु जब वह होश में नहीं आई तो मैं वहीं पास बैठकर रोने लगा। गांव की सुनसान सड़क थी बड़ी-बड़ी देर बाद इक-दुक्का गाड़ियां वहां से गुजरती थीं। हमारे साथ हुए हादसे के समय कोई भी गाड़ी आसपास नहीं थी। तभी एक सज्जन व्यक्ति की मुझ पर नजर पड़ी तो वह दूर अपने खेतों से दौड़ता हुआ मेरे पास आ गया। वह मेरी हालत देखकर सहायता के लिए अपने घर से अपनी गाड़ी ले आया और मेरी पत्नी को उसमें डालकर पास के सरकारी अस्पताल में ले गया।
सरकारी अस्पताल में डॉक्टर ने यह कहकर हमें शहर भेज दिया कि इसके दिमाग में गहरी चोट आई है और इसे जल्दी से जल्दी आप शहर के अस्पताल में ले जाओ। हमारे पास इसके इलाज के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है। हम आपको अपनी एंबुलेंस दे देते हैं। डॉक्टर ने हमें बताए हुए दिमाग के अस्पताल में छोड़ने के लिए एंबुलेंस दे दी। मैं उसे लेकर उसी अस्पताल में आ गया।
अब तक हमारे रिश्तेदारों- दोस्तों को भी पता लग गया था धीरे-धीरे सभी अस्पताल आने लगे। इस उम्मीद से कि जल्दी ही ठीक हो जाएगी। परंतु दिन बीतते गए और हर रोज पैसा खर्च होता गया। परंतु वह कौमा से वापस नहीं आई। डॉक्टर आश्वासन देते रहे, ठीक हो जाएगी, ठीक हो जाएगी चिंता मत करो, इस तरह हमने दो-तीन अस्पताल बदले डॉक्टर जहां बोलते मैं उसे वही ले जाता। अब डॉक्टरों ने कहा इसके दिमाग का ऑपरेशन करना पड़ेगा शायद ठीक हो जाए। इसके लिए पांच लाख रुपए लगेंगे जो आपको पहले जमा करवाने होंगे।
मैं जैसे कैसे पैसे का प्रबंध करता रहा और डॉक्टरों को देता रहा। मैंने अपने खेत बेचकर पांच लाख रुपए इकट्ठे किए और अस्पताल में जमा करवा दिए ताकि ऑपरेशन हो जाए और यह ठीक हो जाए। ऑपरेशन तो हो गया परंतु के इंतजार बाद भी वह ठीक नहीं हुई। अब तो नौबत यहां तक आ गई थी कि मेरे पास उसके साथ रहते हुए रोटी खाने के लिए पैसे खत्म हो गए थे। मैं खरीद कर ढाबे की रोटी नहीं खा सकता था। इतना बुरा हाल हो गया था।
मैंने अस्पताल के बाहर गली के किनारे तिरपाल लगाकर टेंट लगा लिया और गैस और बर्तनों का प्रबंध करके खुद की रोटी वहीं बनाकर समय निकालने लगा। इस उम्मीद में कि शायद यह ठीक हो जाए। और साहब आपको क्या बताऊं अस्पताल में ही एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई। जब मैं डेड बॉडी लेने गया तो डॉक्टर ने कहा पहले इलाज के पैसे एक लाख रुपए जमा करवाओ तब आपको डेड बॉडी देंगे। अब तक मैं बिल्कुल टूट चुका था। यह मेरे लिए नई मुसीबत खड़ी हो गई थी। अब तो मेरे पास एक लाख क्या एक पैसा भी नहीं था। मैंने अपने गांव के पुराने दोस्त को फोन किया और उससे पैसे उधार लिए और तब कहीं जाकर उनको पैसे दिए तो डेड बॉडी हासिल की।
उसके बाद उसे लेकर घर आ गए। घर क्या दो कमरों का मेरा कच्चा मकान है वही बचा है। बाकी तो सारी जमीन जो मेरे पास थी मैंने उसके इलाज के लिए बेच दी है। उसका क्रिया कर्म करने के बाद दो महीने तक में घर में रहा। बेटा भी साथ था। अब वहां रहने का मन नहीं कर रहा था, और सब छोड़-छाड़ कर हम इधर चले आए हैं।” कहते कहते उसकी आंखों की पुतलियां पर आंसुओं की बूंदे तिर आई थीं ।
मैंने कहा-” भाई घबराते नहीं हैं।मर्दों को बड़ी-बड़ी मुसीबतें आती हैं।हौसला ही सबसे बड़ा हथियार होता है आदमी का मुसीबतों से जंग जीतने के लिए।” इससे ज्यादा मेरे पास भी शब्द नहीं थे मैं खुद भी उसकी पीड़ा सुनकर द्रवित हो उठा था।
मैंने कहा-“चाय पियोगे?” बोला-“जी पी लेंगे।” मैंने अपनी पत्नी को चाय बनाने के लिए आवाज लगाई। थोड़ी देर में चाय आ गई थी हम दोनों चाय पी रहे थे। सारे जूते तो उसने गांठ दिए थे।
अब वह मुझे पूछने लगा-“साहब आप क्या करते हो ? कोई नौकरी करते हो या कोई बिजनेस करते हो।”
मैंने बोला- “अब न मैं नौकरी करता हूं न कोई बिजनेस। अभी बिल्कुल बेहला आदमी हूं।” मैंने मुस्कुरा कर कहा-” गप्पे हांकता हूं और कहानियां लिखता हूं।”
वह आश्चर्य से बोला- “अच्छा आप कहानियां लिखते हैं ! क्या कहानियां लिखते हैं आप ?”
मैंने कहा-“मैं अपनी-तुम्हारी दुनिया की कहानियां लिखता हूं। मैं जिंदगी की कहानियां लिखता हूं। यह जिंदगी भी तो कई कहानियों का संग्रह ही है, यहीं से उठाकर कहानियां लिख देता हूं।”
वह बोला-“क्या आप मेरी कहानी भी लिख देंगे?”
मैंने बोला-“हां मैं आपकी कहानी भी लिख दूंगा।”
वह होठों ही होठों में मुस्कुराया। बोला-” सचमुच आप मेरी भी कोई कहानी लिख देंगे?”
मैंने कहा-“जरूर। जब आप अगली बार आओगे आपकी कहानी लिखी मिलेगी।”
वह बोला-” साहब मैं जरूर आऊंगा अगली बार अपनी कहानी सुनने आपके पास।” फिर चाय पीकर वह चला गया।
फिर मैंने एक दिन उसकी कहानी लिख दी और कहानी सुनाने के लिए उसका इंतजार करने लगा। मगर दिन महीने साल बीतते गए वह मुड़कर इधर नहीं आया न जाने वह बंजारा किस देस चला गया था। मेरी लिखी कहानी बरसों तक उसके आने के इंतजार में उसकी राह ताकती रही।।

— अशोक दर्द

*अशोक दर्द

जन्म –तिथि - 23- 04 – 1966 माता- श्रीमती रोशनी पिता --- श्री भगत राम पत्नी –श्रीमती आशा [गृहिणी ] संतान -- पुत्री डा. शबनम ठाकुर ,पुत्र इंजि. शुभम ठाकुर शिक्षा – शास्त्री , प्रभाकर ,जे बी टी ,एम ए [हिंदी ] बी एड भाषा ज्ञान --- हिंदी ,अंग्रेजी ,संस्कृत व्यवसाय – राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में हिंदी अध्यापक जन्म-स्थान-गावं घट्ट (टप्पर) डा. शेरपुर ,तहसील डलहौज़ी जिला चम्बा (हि.प्र ] लेखन विधाएं –कविता , कहानी , व लघुकथा प्रकाशित कृतियाँ – अंजुरी भर शब्द [कविता संग्रह ] व लगभग बीस राष्ट्रिय काव्य संग्रहों में कविता लेखन | सम्पादन --- मेरे पहाड़ में [कविता संग्रह ] विद्यालय की पत्रिका बुरांस में सम्पादन सहयोग | प्रसारण ----दूरदर्शन शिमला व आकाशवाणी शिमला व धर्मशाला से रचना प्रसारण | सम्मान----- हिमाचल प्रदेश राज्य पत्रकार महासंघ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए पुरस्कृत , हिमाचल प्रदेश सिमौर कला संगम द्वारा लोक साहित्य के लिए आचार्य विशिष्ठ पुरस्कार २०१४ , सामाजिक आक्रोश द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में देशभक्ति लघुकथा को द्वितीय पुरस्कार | इनके आलावा कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित | अन्य ---इरावती साहित्य एवं कला मंच बनीखेत का अध्यक्ष [मंच के द्वारा कई अन्तर्राज्यीय सम्मेलनों का आयोजन | सम्प्रति पता –अशोक ‘दर्द’ प्रवास कुटीर,गावं व डाकघर-बनीखेत तह. डलहौज़ी जि. चम्बा स्थायी पता ----गाँव घट्ट डाकघर बनीखेत जिला चंबा [हिमाचल प्रदेश ] मो .09418248262 , ई मेल --- ashokdard23@gmail.com