कविता
स्वर्णिम इतिहास के लिए….
हुक्मरानों की तलवारों और नारों के बीच भी
जीवन का पहिया चलता रहता है
क्योंकि यह पहिया
कभी रुकता नहीं है जैसे हवा मुट्ठियों में
कैद नहीं हो सकती ।
इतिहास साक्षी है नारों की उकसाहट पर
तलवारों की धारों के बीचों-बीच से
गुजर कर भी सदियों से कोई
जीवन के अस्तित्व को नहीं मिटा पाया है।
मौसमों की मार से कितने ही ग्लेशियर पिघलकर
नदियों में उछलते हुए समुद्र में जा मिले
मगर फिर भी शिखर
भरते रहे हैं फिर से सफेद बर्फ की चादरों से
ग्लेशियरों के पिघलने से पर्वत
कभी नहीं पिघलते यह याद रखा जाना चाहिए।
धुएं के गुब्बार कितने भी उठें
बारूद की गंध से यह आसमान कितना भी भर जाए
पेट में उठते हुए भूख के बवंडर और
जीवन जीने की जिजीविषा के सुनहले पंख
बारूद की गंध को ज़ज्ब कर ही लेते हैं
यह याद रखा जाना चाहिए।
समय की दहलीज़ पर
पड़ी हुई बेजान शिलाएं भी एक न एक दिन
किसी बुत तराश के हाथ लगकर
मूर्तियों में ढल आती हैं इसलिए हुक्मरानों को
तलवारों और नारों पर खुद को इतना भी
आश्रित नहीं कर लेना चाहिए।
हुक्मरानों को थोड़ा सा सौहार्द
बेजान शिलाओं के दामन में भी रख देना चाहिए
और करुणा की नदी में
तलवारों और नारों की सारी मलिनता बहाकर
जनता के प्रति
जनता के लिए समर्पित हो जाना चाहिए
ताकि वक्त की शिलाओं पर स्वर्णिम इतिहास
लिखा जा सके।
— अशोक दर्द
