कविता

कोरे कागज सी है ये जिंदगी

कोरे कागज सी है ये जिंदगी लिख सकते हो खुद तुम अपनी तक़दीर,
जैसा होगा तुम्हारा कर्म आज का वैसी ही बनेगी भविष्य की तस्वीर ।

शांति चाहिए तो तुम बनो सर्वप्रथम शांत प्रिय, संतोषी व सदाचारी,
प्रेम का भाव बसा लो तन-मन में जीवों के प्रति बनो दयालु परोपकारी ।

प्रेम चाहिए तो तुम पहले अपने भीतर सात्विकता का भाव जगाओ,
ईर्ष्या-द्वेष के मनोविकार से रहो सुरक्षित शुद्ध विचारों को मन में बसाओ ।

स्वास्थ्य चाहिए तो तुम पहले अपनी दिनचर्या को करो पूर्ण व्यवस्थित,
भोजन हो पूर्ण शुद्ध व आस-पास के वातावरण में शुद्धता हो उपस्थित ।

धन चाहिए तो पहले सीखो करना बचत व अनावश्यक खर्चों पर कटौती,
मत मानो परिस्थितियों को दोषी व हार को जीवन अभिशाप और पनौती ।

सुख चाहिए तो पहले जानो मिल-जुलकर रहना व खुशियों को बॉंटना,
ग़लत कर्म से दूर रहो छोड़ो शिकायतें, आलस्य और बेरूखी का तराना ।

विजय चाहिए तो तुम हौसलों को बुलंद और तन-मन को शक्तिवान करो,
सपनों के पीछे तुम अकेले मत भागो सही सहयोगियों की तलाश करो ।

“आनंद” चाहिए जीवन में तो तुम सदा पहले कृतज्ञ बनो और आभार करो,
दुःखों के भंवर से निकल कर आशाओं के पथ पर ज्ञान का विस्तार करो ।

बड़ा सोचो भला सोचो छोटी-छोटी बातों में मत उलझों रिश्तों में ईमानदार रहो,
प्रभावशाली वाणी व मन की मधुरता का अपने आचरण में सुंदर श्रृंगार करो ।

जिंदगी को इस तरह प्रेम से अपनी चाहतों के रंगों में रंग लो तुम सुनहरा,
जहॉं हर भोर हो उत्साह उल्लास से भरी और हर रात हो प्रसन्नता का पहरा ।

— मोनिका डागा “आनंद”

*मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु