हास्य व्यंग्य

लघु – हास्य — जाती हुई वह

अच्छा तो तुम जा रही हो ?अब कैसे कहें कि जाओ।और कैसे कहें कि मत जाओ। हम कुछ भी तो नहीं कह सकते। क्योंकि न तो तुम हमारे कहने आती हो तो जाओगी भी क्यों? अब तुम्हें जाना है , तो जाना ही है। अपना कोई बस नहीं। कहते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य लेख : प्लास्टिक-युग

कौन कहता है कि यह कलयुग है? जी नहीं ,आपके कलों के युग कलयुग को प्लस्टिक ने अपने आगोश में छिपा लिया है। जहाँ देखें वहाँ प्लास्टिक ही छाया है। ये युग क्या है , प्लास्टिक की माया है। प्लास्टिक की काया है। सब कुछ प्लास्टिक में समाया है।सब पर प्लास्टिक की छाया है।हर आदमी […]

बाल कविता

मछली

मैं मछली कहलाती हूँ। जल में ही रह पाती हूँ।। जल ही तो जीवन है मेरा। निशिदिन करती रहती फेरा।। अपना मन मैं बहलाती हूँ। मैं मछली कहलाती हूँ।। गर्मी हो या वर्षा, जाड़ा। मुझे न मौसम होता आड़ा।। सब कुछ मैं सह जाती हूँ। मैं मछली कहलाती हूँ।। अंडे से मैं बाहर आती। तैर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सियासतों से सुधार नहीं होता। इस पे अब ऐतबार नहीं होता।। आदमी हो तो आदमी मानें, नेता इंसाँ में शुमार नहीं होता। पूँछ जिसकी है भीड़ की लंबी, पूँछ जन – आधार नहीं होता। दोमुहों के कान नहीं होते , दोमुहों से उद्धार नहीं होता। उग आते हैं ख़जूर बीहड़ में, औ’ ख़जूर छायादार नहीं […]

बाल कविता

ईंटों से घर बना हमारा।

ईंटों से घर बना हमारा। विद्यालय भी बनता प्यारा।। मिट्टी को साँचे में भरते। सुघड़ ईंट का सर्जन करते।। भट्टे में तप रूप सुधारा। ईंटों से घर बना हमारा।। तप कर ईंट लाल हो जाती। चट्टों पर सजकर सो जाती।। कहती कैसा रूप निखारा। ईंटों से घर बना हमारा।। घर , मकान , होटल बनवाते। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इतना भी तरसाते क्यों हो ? बहुत देर से आते क्यों हो?? थक जाती हैं आँखें मेरी, इस दिल को भरमाते क्यों हो? नाज़ुक बदन सफर में काँटे, हमें छोड़कर जाते क्यों हो? शबनम भी शरमा जाती है, फूलों – सा मुस्काते क्यों हो? हमें खयालों में ला – लाकर, मन ही मन मुस्काते क्यों […]

सामाजिक

ललित लेख – मैं जाड़ा हूँ

सबका अपना -अपना मौसम होता है। जिसमें सब अपने मन की करते हैं। जब मौसम की जवानी आती है। सब क़ायनात झुक जाती है। मैं जाड़ा कहलाता हूँ । सबकी तीन अवस्थाओं की तरह मेरी भी तीन अवस्थाएँ होती हैं। बचपन ,यौवन और वृद्धावस्था। शरद ही मेरा बचपन है।बचपन किसे अच्छा नहीं लगता, चाहे वह […]

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया – देश हमारा धर्म है!

भौंका कुत्ता एक जब , हुआ गली में शोर। भौं भौं भौं मचने लगी, हुई भयावह भोर।। हुई भयावह भोर, सभी क्यों भौंक रहे हैं। अज्ञानी , राही की – राहें रोक रहे हैं।। ‘शुभम’ न तुलसी – कुंज, उग रहे कूकरमुत्ता। भौंके कुत्ते खूब, प्रथम जब भौंका कुत्ता।।1। चाटा जिसने रक्त ही, उसे रक्त […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कलम है, कोई तलवार नहीं है। तूलिका है, कोई हथियार नहीं है।। अंदाज़ नहीं है, तुझे असर इसका, शांत रहती है, इज़हार नहीं है। जो कह दिया है , अमर है वाणी, रद्दी में बिके , वह अख़बार नहीं है। अदीब की आवाज रोक सके कोई, संगेमरमर की वह दीवार नहीं है। अपनी ही पतवार […]

बाल कविता

बालगीत – लाल टमाटर

मैं हूँ गोल टमाटर लाल। करता लाल तुम्हारे गाल।। पेरू से मैं भारत आया। योरूप में भी नाम कमाया।। लव एपल का बड़ा कमाल। मैं हूँ गोल टमाटर लाल।। मुझे मानते हैं जो सब्जी। कर लें दूर वहम की कब्जी।। मैं फल हूँ गठिया का काल। मैं हूँ गोल टमाटर लाल।। खुजली हो या बेरी […]