गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

किसी मासूम की हंसी में थोड़ा खिलकर देखिए या किसी मज़लूम के अश्कों में ढल कर देखिए छोड़ जाना हाथ में कातिल के खुशबू मरके भी सीखना हो तो किसी गुल को मसलकर देखिए ज़ख़्म अपने क्या दिखाएं आपको महफिल में हम हो कभी फुर्सत तो तन्हाई में मिलकर देखिए यूँ न हो पाएगा अंदाज़ा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

माना पहले से ताल्लुकात नहीं बुरे इतने भी पर हालात नहीं ख्वाब में अब भी रोज़ आते हैं जिनसे बरसों से मुलाकात नहीं हिज्र जैसी सज़ा नहीं कोई वस्ल जैसी कोई सौगात नही तुम्हें चाहा है, तुम्हें चाहूँगा तुम न चाहो तो कोई बात नहीं ज़िंदा रहती हैं ता-कयामत ये लोग मरते हैं, ख्वाहिशात नहीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जलूँगा कब तलक तनहा मैं शरारों की तरह, कभी उतरो मेरे आँगन में सितारों की तरह मैं एकटक तुझे देखा करूँ, देखा ही करूँ, चाँदनी रात के पुरनूर नज़ारों की तरह पास रह के भी मिलना ना हो सका अपना, बरसों साथ चले हम दो किनारों की तरह छुपा के रखता मैं दुनिया से तुम्हें […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

समझौता कदम कदम पर करना पड़ा मुझे जीने की आरज़ू में रोज़ मरना पड़ा मुझे अपनी थी बात जब तलक डरता नहीं था मैं अपनों की जो बात आई तो डरना पड़ा मुझे यूँ ही नहीं पहुंच गया हूँ मंज़िलों पे मैं अंगारों भरी राह पर चलना पड़ा मुझे सबूत अपनी बेगुनाहियों का देने को […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

दिल तेरी मुहब्बत का जो गुलाम नहीं होता तेरा ज़िक्र लबों पर फिर सुबह शाम नहीं होता बदनामी मेरी मुझको मशहूर न करती तो गुमनाम ही रहता मैं, मेरा नाम नहीं होता तू हाथ बढ़ा देता एक बार जो मेरी सिम्त मेरा प्यार सरे-महफिल नीलाम नहीं होता काश सीख लिए होते दुनिया के चलन मैंने […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

सुन ले जाते हुए मुँह फेर के जाने वाले दोस्त मिलते हैं कम ही साथ निभाने वाले फिर तू माँगे दुआओं में चाहे कितना भी हम भी दोबारा नहीं लौट के आने वाले किसी के गम को अपना गम समझे कौन यहां तमाशा देखने लगते हैं ज़माने वाले सर पे चढ़ जाता है गरुर-ए-कामयाबी जब […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मेरी हर ग़ज़ल कसीदा तुम्हारी शान में है तुम सा न दूसरा कोई पूरे इस जहान में है हर महफिल मुझे लगे है तेरी ही महफिल रहूँ कहीं भी मैं बस तू ही मेरे ध्यान में है कुछ ऐसा लगता है नकाब में तेरा चेहरा जैसे तलवार दोधारी कोई म्यान में है मिलन से ज्यादा […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

ज़ख्मों पे मरहम रखने उतरी हो जो खला से लगते हो तुम मुझे उस पाकीज़ा सी दुआ से हर बार ये लगता है शायद तू आ गया है होती है जब भी आहट दर पर मेरे हवा से खामोशियों को मेरी जो समझ रहे हो तुम तो समझे न समझे दुनिया सारी मेरी बला से […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

मेरे जज़्बात से बिल्कुल ही बेखबर निकला मेरा महबूब संगदिल किस कदर निकला मुझे लगा था कि दो – चार बूँदें होंगी बस छोटी सी आँख में अश्कों का समंदर निकला दोबारा तुझसे न हो पाई मुलाकात कभी उस रहगुज़र से यूँ तो मैं अक्सर निकला कभी मंदिर, कभी मस्जिद तो कभी गिरजे में मैं […]

गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

माना तेरी मुहब्बत का मैं हकदार नहीं मगर इस दिल पे मेरा कोई इख्तियार नहीं दोस्ती, वफा और इश्क़ जहाँ बिकते हों जहां में रिश्तों का ऐसा कहीं बाज़ार नहीं तू ही पहली जुस्तजू है तू ही आखरी भी कैसे कह दूँ कि मैं तेरा तलबगार नहीं किसी तरह की कोई शर्त हो शामिल जिसमें […]