सामाजिक

उम्र के रेगिस्तान में नारी के विकास में नागफनी काव्य धारा नहीं बाढ़ बनी है

जीवन की पगडंडियों पर उम्र बिताते ‘क्या खोया क्या पाया’ जब एक प्रश्न चिह्न बनकर सामने आता है तो लेखा-जोखा दिखाता है कि नफ़ा कम, नुकसान बहुत ज़्यादा हुआ है। कहीं न कहीं मानवता मात खाती आ रही है और अगर मानवता की इस अस्थिर स्थिति का कहीं कोई दोष है तो किसी हद तक […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल     

मुझे दे पाक दिल मौला न धन माँगू न मैं सोना विकारों से हैं मन मैले शरीरों को है क्या धोना वो पारस क्या जिसे छूकर न लोहा बन सके सोना ग़मों को मैंने चुन-चुन कर सजाया दिल का हर कोना न ऐसी चाह रख दिल में जिसे पाकर पड़े खोना ग़मों को जब हंसी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल     

गुलशनों पर शबाब है उसका ये करम बेहिसाब है उसका अश्क कितने मिले, खुशी कितनी उलटा-सुलटा हिसाब है उसका मौत तो उसकी ओट लेती है ज़िन्दगी इक नक़ाब है उसका ये ख़ुदाई जो देखते हैं हम कुछ नहीं, एक ख़्वाब है उसका तन की चादर महीन है इतनी बस मुरव्वत हिजाब है उसका साज़ सरगम समाए हैं […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब ख़लिश बेपनाह होती है लब पे इक सर्द आह होती है ज़िंदगी जिसको दर-ब-दर कर दे मौत उसकी पनाह होती है ज़ुलम होता है जब भी धरती पर आसमाँ की निगाह होती है इश्क का हश्र और क्या होगा ज़िंदगानी तबाह होती है पीठ पीछे बुराई की आदत बद से बदतर गुनाह होती है […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : शहर में

परदेसी है वो कोई भटकता है शहर में गांवों को याद करके सिसकता है शहर में मिलना बिछड़ना यह तो मुक़द्दर की बात है किससे गिला करे वो झिझकता है शहर में ज़ालिम चुरा के लाया है गुलशन की आबरू वह गुल-फरोश सबको खटकता है शहर में दीवारो-दर को कैसे बनाऊँ मैं राज़दाँ ये प्यार […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : है सोमरस की पियाली ग़ज़ल

मुझे भा गई, मेरे साक़ी ग़ज़ल कि है सोमरस की पियाली ग़ज़ल पिरोकर वो शब्दों में अनुभूतियाँ मेरी सोच को है सजाती ग़ज़ल नई मेरी शैली, नया है कथन है इक अनसुनी-अनकही-सी ग़ज़ल मचलती है अश्कों-सी पलकों पे वो मेरे मन की है बेक़रारी ग़ज़ल सभी के जो सुख-दुःख में शामिल रहे उसी को तो […]