धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

धर्म और नैतिकता

‘धर्म’ शब्द धृञ् धारणे धातु से ‘मन’ प्रत्यय करके निष्पन्न होता है। इसका अर्थ है-धारण, पोषण और रक्षा करना। इसलिए जो धारण किया जाता है, वह धर्म है। वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद कहते हैं-‘यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः’ अर्थात् जिन कर्मों का अनुष्ठान करने से मनुष्य जीवन का अभ्युदय हो और अन्त में निःश्रेयस की प्राप्ति […]

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उन्नति का मार्ग

समस्त जीवधारियों में मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि हे पुरुष, यह जीवन उन्नति करने के लिए है, अवनति करने के लिए नहीं। परमेश्वर ने मनुष्य को दक्षता और कार्यकुशलता से परिपूर्ण किया है। ईश्वर यहां हमें पुरुष शब्द से संबोधित कर रहे हैं जिसका अर्थ है जो कार्य […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

अध्यात्म रोग

शास्त्रों में तीन प्रकार के दुःख बताए गए हैं- आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक। आधिभौतिक दुःख अत्याचारी मनुष्यों और हिंसक पशुओं आदि से उत्पन्न होते हैं। आधिदैविक दुःख अति वृष्टि, आंधी, भूकम्प आदि प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न होते हैं। आध्यात्मिक दुःखों या अध्यात्म रोगों में मन, इन्द्रिय, शरीर आदि के दुःखों का समावेश होता है। भगवद्गीता […]

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संकल्प शक्ति

संकल्प शब्द सम् तथा कल्प से मिलकर बना है। सम् का अर्थ है सम्यक्-अच्छी प्रकार। कल्प का अर्थ है निर्णय, निर्माण और प्रेरणा। आत्मा से प्राप्त संदेश या आदेश को क्रियान्वित करने का अडिग निर्णय करके कार्य की सम्मति के लिए मस्तिष्क और इन्द्रियों को आदेशात्मक प्रेरणा देना संकल्प है। यही मन का स्वाभाविक धर्म […]

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विचार शक्ति

हमारा व्यक्तित्व विचार और चिन्तन से बनता है। यह जीवन भर के चिन्तन और समस्त विचारों का प्रतिफल होता है। हम विचारों के द्वारा ही उन्नति कर जीवन के उच्चतम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। जीवन वैसा ही होता है जैसा हमारे विचार उसे बनाते हैं क्योंकि यह विचारों का दर्पण है। इस प्रकार विचार […]

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पुरुषार्थ

जिन कार्यों को करने से हमारे प्रयोजन सिद्ध होते हैं वे पुरुषार्थ कहलाते हैं। वेदादि शास्त्रों में मनुष्य के करने योग्य चार पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म अर्थ, काम और मोक्ष। धर्मपूर्वक धन प्राप्त करने हेतु परिश्रम करना आर्थिक पुरुषार्थ है। ईश्वरीय सृष्टिक्रम में हमें निरन्तर कर्म करने की शिक्षा मिलती है। हम जिस पृथ्वी […]

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महानता

किसी भी व्यक्ति की महानता को आंकने के लिए प्रत्येक समाज या विचारधारा के अलग-अलग पैमाने होते हैं। इन्हीं के आधार पर अशोक, अकबर और सिकन्दर आदि को महान कहा गया है। वेदों में महानता के पांच लक्षण बताये गये हैं। प्रथम लक्षण है व्यक्ति का कर्मयोगी होते हुए परमेश्वर, समाज और राष्ट्र के लिए […]

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नारी का सम्मान

नारी और पुरुष समाज रूपी रथ के दो पहिये हैं। दोनों के सांमजस्य से संसार में जीवंतता का संगीत सुनाई देता है। उसका यशगान भारतीय संस्कृति में सदा से होता रहा है। नारी की महिमा का गान मनु, वेदव्यास, याज्ञवल्क्य, पाराशर आदि ऋषियों ने अपने ग्रन्थों में किया है परन्तु इसका मूलस्रोत वेद-संहिताएं हैं। वेद […]

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तप का स्वरुप

तप का अर्थ है- पीड़ा सहना, घोर कड़ी साधना करना, मन का संयम रखना आदि। महर्षि दयानन्द के अनुसार ‘‘जिस प्रकार सोने को अग्नि में डालकर इसका मल दूर किया जाता है उसी प्रकार सद्गुणों और उत्तम आचरणों से अपने हृदय, मन और आत्मा के मैल को दूर किया जाना तप है। गीता में तप […]

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अस्तेय-व्रत

अस्तेय का अर्थ है– चोरी न करना। किसी वस्तु को बिना मूल्य चुकाए या परिश्रम किए बिना प्राप्त करना भी चोरी है। जिस वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं हैं, उसे पाने की इच्छा बीजरूप में चोरी ही मानी जाएगी। मन पर काबू करते हुए इस दुर्गुण से बचना अस्तेय व्रत है। काम, क्रोध, लोभ, मात्सर्य आदि मनोविकारों के […]