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  • स्मृति के पंख – 44

    फिर केवल के रिश्ते के लिए एक सज्जन मिले श्री फकीरचन्द जी, जिनकी बहन की लड़की के बारे वह केवल का रिश्ता कराने की बातें कहते थे। उनकी बहन जबलपुर की थी। फकीर चन्द का जीजा...

  • स्मृति के पंख – 43

    अब नये काम के लिए, जो टी0वी0 का लाइसेंस मिला था, काफी रुपये की जरूरत थी। मैंने वह प्लाट जो कोठी बनाने के लिए खरीदा था, फरोख्त करके इक्कीस हजार रुपये शांति स्वरूप और तिलकराज को...



  • स्मृति के पंख – 40

    अनन्त राम को बाकी रुपया तो मैं अदा कर चुका था, सात सौ उसका बाकी रह गया था। जब मिलनी पर सुभाष और कमलेश जाने लगे, तो मैंने सुभाष को कह दिया कि बरेली में चाचा...

  • स्मृति के पंख – 39

    भ्राता जी कभी कभी लुधियाने आते रहते। उनकी जुबानी मोहिनी की अच्छाई और शराफत सुनता तो बहुत अच्छा लगता। शाम को और खाने के साथ साथ बातें भी होती रहती। इन्हें अब दर्द की अकसर शिकायत...

  • स्मृति के पंख – 38

    घर में अब एक नई पार्टी बन गई थी और इनका बोल बाला था। नई पार्टी में राकेश, गुड्डा, केवल, गुलशन (गुट्टू) ये सब मेम्बर थे और उस नई पार्टी की रौनक थी पूरे घर में।...

  • स्मृति के पंख – 37

    1971 में रमेश की नौकरी देहरादून में मिनिस्ट्री आफ डिफेन्स में लग गई और वह देहरादून आ गया। फिर 1972 में मिनिस्ट्री आफ फाइनेंस में देवास में नौकरी लग गई, जहाँ नया प्रोजेक्ट लगाया गया था।...

  • स्मृति के पंख – 36

    30 अप्रैल 1957 को राज की शादी हुई। डोली जाने के बाद कुछ ही दिन बाद मुझे तार मिला कि राज बीमार है। हम दोनों मुजफरनगर चले गये। वहाँ ऐसा चर्चा सुना कि पृथ्वीराज का भूत...