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  • कविता : दर्पण

    कविता : दर्पण

    देखा करो अपने आप को कभी दर्पण में शायद तुम्हें नज़र आएगा तुम्हारा मचलना, देखा करो अपनी आँखों की पुतली को कभी दर्पण में शायद तुम्हें महसूस होगा तुम्हारा अफ़साना, देखा करो अपने गुलाबी होंटों को...

  • कविता : मेरे भय्या

    कविता : मेरे भय्या

    तेरे साथ जो बीता बचपन कितना सुन्दर जीवन था, ख़ूब लड़ते थे फिर हँसते थे कितना सुन्दर बचपन था, माँ जब तुझको दुलारती मेरा मन भी चिढ़ता था तू है उनके बुढ़ापे की लाठी ये मेरी...

  • कविता : मेरा तिरंगा

    कविता : मेरा तिरंगा

    सुनो, तिरंगा मेरे मन की बात तुझे सुनाऊं मैं, तू है मेरे देश की शान यह सबको बतलाऊं मैं, खिल उठता है मेरा मन जब लहराते तुम दिखते, देश की आज़ादी की गाथा इसी तरह तुम...

  • कविता : प्रेम

    कविता : प्रेम

    प्रेम और सत्य दोनों ही ढाई अक्षर के शब्द हैं… कितने सुन्दर कितने पवित्र हैं ये शब्द, जो ह्रदय से अपनाले सुंदरता की मूरत बन जाता है और सत्य की राह पे चल कर प्रेम को...

  • अंजान सफ़र

    अंजान सफ़र

    मैं अंजान हूँ इस सफ़र में मुझे कुछ नहीं है आता तू ही बता मेरे साथी कैसे बढूँ इस डगर में। चुन ली है राह मैंने तेरे संग ज़िन्दगी की अब तू ही मेरा सहारा अब...

  • कविता : मैं बेटी हूँ

    कविता : मैं बेटी हूँ

    मैं बेटी हूँ फिर भी मैं अकेली हूँ मैं सबकुछ नहीं कर सकती क्योंकि मैं बंधन में बंधी हूँ किसी को मैं पसंद नहीं तो कोख में ही मार दी जाती हूँ गर में किसी को...