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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    ग़म  के’ सैलाब  पिया  करती है। ये  ज़मी  यूँ  ही’  जिया करती है।।   ज़िन्दगी  ख़्वाब दिखाती जो भी। कब  हक़ीकत में’ दिया करती है।।   बे-हिसी   तंज   ज़माने  भर  के। मुफ़लिसी  रोज लिया...



  • पाषाण – मनुज

    पाषाण – मनुज

    अमित अमीत अधूत आज क्यों , मनमानी कर उतराये हैं ? समीकरण क्यों बदल रहे हैं, समदर्शी क्यों घबराये हैं ? अब कैसी है यह दुरभिसंधि, दुरुत्साहन यह कैसा है ? दुराग्रही के आगे नत क्यों,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    तल्खियाँ दिल से भुलाते तो चमन गुलजार होता । गीत मेरे गूँजते मनमीत का गर प्यार होता ।। वो खुदा फरखुंद उल्फ़त की इबादत से नवाजे । पर चलन कैसा अजूबा रूह का व्यापार होता ।।...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    गज़ल *****   लहू का  रंग इक जैसा,चली  तलवार जाने  क्यूँ। वही मौला वही कृष्णा  , बँटे  दरबार   जाने क्यूँ।।   सिसकता खूबसूरत जग ,बना ,जगतार जाने क्यूँ। सजा का समझता है,स्वयं को,हकदार जाने क्यूँ...

  • गज़ल

    गज़ल

    तुम न होगे तो और क्या होगा । कोई मंज़िल न रास्ता होगा ।। दिन न निकलेगा बिन तेरे दिलबर। स्याह रातों का सिलसिला होगा।। ज़ीस्त तेरे ही नाम कर दी है। वो ही होगा कि...


  • गज़ल

    गज़ल

    लहू का रंग इक जैसा, चली तलवार जाने क्यूँ। वही मौला वही कृष्णा, बँटे घरबार जाने क्यूँ।। सिसकता खूबसूरत जग, बना, जगतार जाने क्यूँ। सजा का समझता है, स्वयं को, हकदार जाने क्यूँ ।। लगी है आग नफरत की, धुआँ...