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  • निर्भया-न्याय ?

    निर्भया-न्याय ?

    थी निर्भया या दामिनी, या मात्र नारी याचिनी। सृष्टि-अभया दिव्य पूजित, दुख सह रही जग-दायिनी।। कैसी विधा है न्याय की, क्या न्याय-परिभाषा रही। पलड़ा बराबर यदि नही, क्या माप की आशा सही।। क्षत विक्षत तन मन...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    आँखों को भी मल मल देखा। तुमको खुद में हर पल देखा।। बारिश के मौसम में आकर। बादल सा मन पागल देखा।। जब – जब आयी तेरी बातें। रीता तन- मन घायल देखा।। वापस आओ रूठो...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    ज़िन्दगी है अगर और क्या चाहिए। हौसला बा-हुनर और क्या चाहिए।। डोर मजबूत हो प्यार विश्वास की। आज दौरे-सफर और क्या चाहिए।। आँधियों से गुज़ारिश थमें अब ज़रा। हों सलामत शज़र और क्या चाहिए।। सिर्फ़ तालीम...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    अनसुनी करता नहीं उसको सुनाकर देखना। हौसला रखकर ख़ुदा को सच बताकर देखना।। मुंतज़िर तेरी निगाहें रूह भी बेचैन कुछ। है हसीं ये ज़िन्दगी तू दिल लगाकर देखना।। साजिशें कब तक चलेंगी तीरगी की नूर पर।...



  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    ग़म  के सैलाब  पिया  करती है। ये  ज़मी  यूँ  ही  जिया करती है।।   ज़िन्दगी  ख़्वाब दिखाती जो भी। कब  हक़ीकत में दिया करती है।।   बे-हिसी   तंज   ज़माने  भर  के। मुफ़लिसी  रोज लिया...


  • पाषाण – मनुज

    पाषाण – मनुज

    अमित अमीत अधूत आज क्यों , मनमानी कर उतराये हैं ? समीकरण क्यों बदल रहे हैं, समदर्शी क्यों घबराये हैं ? अब कैसी है यह दुरभिसंधि, दुरुत्साहन यह कैसा है ? दुराग्रही के आगे नत क्यों,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    तल्खियाँ दिल से भुलाते तो चमन गुलजार होता । गीत मेरे गूँजते मनमीत का गर प्यार होता ।। वो खुदा फरखुंद उल्फ़त की इबादत से नवाजे । पर चलन कैसा अजूबा रूह का व्यापार होता ।।...