गीत/नवगीत

कजरी

कृष्णा रास रचाए मधुबन में राधा जी के संग में न। &&&&&&&&&&&& रिमझिम बरसे फुहार ले ले सावन का बहार राधा रानी का मुखड़ा निहार के राधा जी के संग में न कृष्णा रास………. &&&&&&&&&&&&&& ग्वाल बाल सब आए मिलकर रास रचाए सब सावन के मस्ती में झूम के राधा जी के संग में न […]

बाल कविता

बाल कविता

आओ बच्चे राज दुलारे घर आंगन के हो परवाने खेल खेल में खूब इतराए आपस में सब खुशियां बांटे प्यारे प्यारे किलकारियों से घर आंगन में महक समाए दादा दादी, नाना नानी बच्चों को सब खूब खेलाए कभी शरारत कभी झगड़ा सब बच्चे मिल खूब डराते दादा दादी लोरी गाते बच्चे को खूब मन भाते। […]

भजन/भावगीत

सरस्वती मां

हे मां सरस्वती सनले पुकार मेरी तू विधा दायनी भयहारिणी भक्तो को अपने तार दे मां। तेरी दया के आंचल में शीतल बयार के छाव में तू विद्या का भंडार दे जीवन सवार दे मां। तेरी कृपा से मैया चलती है नैया मेरी तू वीणा वत्सल भगवती करदे उद्धार मेरी। श्वेताम्बर से विभूषित रखती दया […]

कविता

प्रकृति

आज चलो उपवन पधारे है अकिंचन गीत गाएं हरा भरा हरियाली छाई प्रकृति ने जो छवि दिखाई। हर तरफ है शान सोहरत मोर भी देख नृत्य करता यह छवि मन मोह लेता सारा जग सुन्दर सा लगता। इस समय वन बाग उपवन खिल उठे सब झूम उठे हैं रिमझिम बारिश बरस रही है आज मौसम […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल*

* ये सितारों का आना हुई बेखबर रात भर जुगनू बन संवरती रही। ये हवाओं का झोंका ठहरती नहीं दिल की दरियां में आंसू छलकती रही। ये झिलमिल सितारों की कैसी डगर चांद तारों के साथ जगमगाती रही। ये नदियों की धारा क्या कह रही मिलकर सागर में सरिता समाती रही। ये फूलों की बगियां […]

बाल कविता

बाल कविता

आओ बच्चों खेलो खेल नानाजी के आंगन खेल नन्ही नन्ही तितली पकड़ो रंग – बिरंगे पंखों देखो यहां उड़ेगी वहां उड़ेगी जब पकड़ो तो खूब उड़ेगी धागा बांधकर खूब उड़ाओ आसमान का सैर कराओ रंग – बिरंगे फूलों पर बैठी सबके मन को मोह लेती बच्चे भी खूब करते खेल देखो खूब मचाए शोर! — […]

कविता

कोरोना

किस कदर ये कोरोना का आना हुआ किस कदर ये कोरोना का जाना होगा ये तो चीनी के बंदिसो से फैला हुआ आकर भारत में शोर खूब मचा रहा सोशल डिस्टेंस है इसका दवा सही मौत के गाल में जो फँसा हुआ किस कदर ये कोरोना का आना हुआ किस कदर ये कोरोना का जाना […]

कविता

सवेरा

सूर्य की किरणें आंखे खोले मन्द मन्द मुस्कुरा रही प्रात: जगत के आगमन से मन प्रफुल्लित हो उठा! भौरें भी फूलों से लिपटे पक्षी भी खूब करवल करते मन्द हवाएं शीतल बहती मानव को आगाध कराती खेतों की हरियाली देखो हरे घास पर मोती बिखरे मानो सबका दिल हर लेता सूर्य की किरणें आंखे खोले […]

कविता

जनजातियां

आदिवासी कहे या जनजातियां इनकी जीवन को क्या कहने रही फूस की टूटी झोपड़ी फटे पुराने कपड़े पहने कपड़े भी खूब मेला रहते बच्चो की तो जीवनलीला ही कैसा सुबह शाम सब धूल में खेले रात अंधेरे में लिपट गए क्या कुदरत की कैसी माया कैसा उनको जीवन दिया! व्रत त्योहार से मतलब नहीं खान […]