मुक्तक/दोहा

कुछ मुक्तक

पुण्य हो गए शून्य मात जगदंबा बोली बढ़ गया पापाचार कि देखो धरती डोली उजड़ गया घर बार, मिला सब कुछ धरती में गये काल के गर्त मेरे सारे हमजोली   हमसे पूछा न गया उनसे बताया न गया प्यार मन में ही रहा ,होठों पर लाया न गया लट एक झटके से पलकों पे […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

रातों को चाँद सितारों से कहते हम अपने अफसाने पलकों की ठंडी सेजों पर जो स्वप्न सजाये अनजाने होंठों से बाहर आ न सकी छिप गईं हृदय के कोने में तेरे मेरे मन की बातें या तो मैं जानूं या तू जाने — लता यादव

पद्य साहित्य मुक्तक/दोहा

मोहब्बत

मोहब्बत की उम्मीद पे ही जिन्दगी सँवरती है झुकी – झुकी नजरों में मोहब्बत बसीं रहती है मोहब्बत में ही सब कुछ बयां हो जाता है यारों इशारे ही सबकुछ है जो लबों पे नहीं आती हैं। @रमेश कुमार सिंह

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : भाव हमारे चित्र तुम्हारे

भाव हमारे चित्र तुम्हारे दोनों एकाकार हो गए शब्दों की माला में गुँथ कर नीलकंठ का हार होगए शिल्पी ने पाषाणों पर शिवशक्ति जीवन्त किये अभिषेकित हो जल धारा से स्वप्न सभी साकार होगए उछलती झूमती नदी कितनी इठलाती है वक्ष पर पत्थर के शिव शिव लिख जाती है अचरज से मानव अवाक रह जाता […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक माणिक

प्रेम की अविरल बहेगी धार जब ; खिलखिलायेगा सकल संसार जब । तब किसी मन में ना होगी कामना ; सत्य से हो जाओगे दो चार जब ।   रास्ते हो जाय सब दुश्वार जब ; पाओं चलने से करें इंकार जब । हैं सहारा एक बस परमात्मा ; बेसहारा छोड़ दे संसार जब । […]

मुक्तक/दोहा

दोहे : रौशनी के क़तरे

घट में राखे राम जो , हनुमत वीर कहाय | शबरी प्रेम में बावरी , जूठे बेर खिलाय || अश्क पीर और प्यास से, नैनन नीर बहाय | तब ही जानी राम जी , अब मोहे मिल जाय || मन -मृग घूमे बावरा , मृग कस्तूरी चाह | कस्तूरी नभ में छुपी , मृग को […]

मुक्तक/दोहा

कातर नैन…

रंग बिरंगेंजीवन की स्वर्णिम आभा तेरी हो। तेरे चेहरे का नूर सदा आॅंखों को सुख देता हो। कल्पित स्वर्ण जीवन में तेरे मुकुट के जैसा हो। भीख मांगते हाथ मेरे दानी माता जैसा हो। लूट पड़े या टूट पड़े सब कातर नैन हमारे हो। बाट जोहता मात तेरी मै जित खड़ा, उत दर्शन तेरा हो। […]

मुक्तक/दोहा

अन्नदाता है तेरा

अन्नदाता है तेरा मौत निशानी दे दे । उसकी फाँसी की कोई और कहानी दे दे ।। रूपये साठ में होने लगे हैं फर्ज अदा । ऐ खुदा आँख में कुछ शर्म का पानी दे दे ।। लुट गया वो है सियासत के मेहरबानो से । बहुत टूटा है यहाँ अपने हुक्मरानों से ।। दर्द […]

मुक्तक/दोहा

एक मुक्तक

आवन कह गए अजहुँ न आए, कहाँ गए मोरे श्याम बाट निहारत थक गई अँखियाँ निशि दिन आठों याम सूना पनघट रीती गगरी, सांझ ढली साँवरिया जमुना के तट पर टेरत हारी, सुध लेलो घनश्याम — लता यादव

मुक्तक/दोहा

मुक्तक (किस्मत)

मुक्तक (किस्मत) रोता नहीं है कोई भी किसी और के लिए सब अपनी अपनी किस्मत को ले लेकर खूब रोते हैं प्यार की दौलत को कभी छोटा न समझना तुम होते है बदनसीब ,जो पाकर इसे खोते हैं मुक्तक प्रस्तुति: मदन मोहन सक्सेना