कविता

कैसी विडंबना है ये …

कैसी विडंबना है ये
कहीं तरसते हाथ लरसती आँखें
माँ बाप की गोद पाने को औलाद
और
कहीं जन्म होते ही डाल दिया जाता
कचरे के डिब्बे में या अनाथालय
कैसी विडंबना है ये…
कहीं तरसते अंनाथ माँ बाप के साथ को
और
कहीं अपने ही माँ बाप को छोड़ जाते
वृद्ध आश्रम
कैसी विडंबना है ये…
जीवन भर जलता रहे मानस
द्वेष , ईर्षा, लालच की अग्नि में
और
अंत : चिता पर जलता ही हो जाये
विदा दुनिया से
कैसी विडंबना है ये…
पहले घर कच्चे थे लेकिन रिश्ते पक्के
और
आज घर पक्के रिश्ते कच्चे
कैसी विडंबना है ये
आज …
न प्यार , न एहसास , न रिश्तों
का रहा कोई मोल
बस एक आह , एक ख़ामोशी ,एक सदा
बिन कही… बिन सुनी …बिन देखी
कैसी विडंबना है ये…
कैसी विडंबना है ये जीवन की
जो न जीने दें न आस छोड़ने दें ||

— मीनाक्षी सुकुमारन

मीनाक्षी सुकुमारन

नाम : श्रीमती मीनाक्षी सुकुमारन जन्मतिथि : 18 सितंबर पता : डी 214 रेल नगर प्लाट न . 1 सेक्टर 50 नॉएडा ( यू.पी) शिक्षा : एम ए ( अंग्रेज़ी) & एम ए (हिन्दी) मेरे बारे में : मुझे कविता लिखना व् पुराने गीत ,ग़ज़ल सुनना बेहद पसंद है | विभिन्न अख़बारों में व् विशेष रूप से राष्टीय सहारा ,sunday मेल में निरंतर लेख, साक्षात्कार आदि समय समय पर प्रकशित होते रहे हैं और आकाशवाणी (युववाणी ) पर भी सक्रिय रूप से अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं | हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रहों .....”अपने - अपने सपने , “अपना – अपना आसमान “ “अपनी –अपनी धरती “ व् “ निर्झरिका “ में कवितायेँ प्रकाशित | अखण्ड भारत पत्रिका : रानी लक्ष्मीबाई विशेषांक में भी कविता प्रकाशित| कनाडा से प्रकाशित इ मेल पत्रिका में भी कवितायेँ प्रकाशित | हाल ही में भाषा सहोदरी द्वारा "साँझा काव्य संग्रह" में भी कवितायेँ प्रकाशित |

2 thoughts on “कैसी विडंबना है ये …

  • मीनाक्षी सुकुमारन

    तहे दिल से शुक्रिया विजय जी

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छी कविता, मीनाक्षी जी.

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