गीतिका/ग़ज़ल

झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल

झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल,
खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल

भटके न राहगीर कोई राह प्यार की,
रक्खे हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल

दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया,
झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल

अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम,
हर सांस महकती है लिए बंदगी के फूल

है तसफिये की ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात,
खिलते हैं दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल

छूकर ग़ुल-ए-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी,
होंठों पे गुनगुना रहे हैं शायरी के फूल

हस्ती को अपनी पहले मुकम्मल तो कीजिये
खिलते हैं बहुत मुश्किलों से आदमी के फूल

भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी “नदीश”
अशआर तेरे आये हैं लेके सदी के फूल

©® लोकेश नदीश

One thought on “झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ! वाह वाह !!

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