गीत/नवगीत

अरमाँ अधूरे रह गये

मेरे जीवन के सारे अरमां अधूरे रह गये
जो देखे थे ख्वाब आँसू के संग बह गये

दिल में मैंने ख्वाबों की बनाई आशियाँ
रहने से पहले ही गम की चल गयी आँधियाँ
उस हवा के साथ जीने की चाह उड़ गये
जो देखे थे…

जिसने साथ जीने मरने की खायी थी कसम
छोड़ दिया वही साथ कोरा कर दिया जीवन
जिसके साथ उड़ती वही तो पंख कतर दिये
जो देखे थे…

भूल गया वो मुझको मैं करती हूँ उसको याद
जीती हूँ इस उम्मीद से वो होगा एकदिन साथ
समझा न कोई दर्द हम मुस्काते रह गये
जो देखे थे ख्वाब आँसू के संग बह गये

मेरे जीवन के सारे अरमाँ अधूरे रह गये
जो देखे थे ख्वाब आँसू के संग बह गये
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दीपिका
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दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं दीपिका दीप्ति हूँ बैजनाथ यादव की नंदनी, मध्य वर्ग में जन्मी हूँ माँ है विन्ध्यावाशनी, पटना की निवासी हूँ पी.जी. की विधार्थी। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।। दीप जैसा जलकर तमस मिटाने का अरमान है, ईमानदारी और खुद्दारी ही अपनी पहचान है, चरित्र मेरी पूंजी है रचनाएँ मेरी थाती। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी।। दिल की बात स्याही में समेटती मेरी कलम, शब्दों का श्रृंगार कर बनाती है दुल्हन, तमन्ना है लेखनी मेरी पाये जग में ख्याति । लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।।

2 thoughts on “अरमाँ अधूरे रह गये

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत अच्छा गीत !

  • मेरे जीवन के सारे अरमाँ अधूरे रह गये
    जो देखे थे ख्वाब आँसू के संग बह गये
    वाह बहुत खुब।

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