गीत/नवगीत

दिल छू ले मंजिल

मेरे दिल यूं न टूट के बिखर जा
माना कि क़ई बार मैंने हार को पाया
पर ये दिल यूं ना खो हौंसला
फिर से आगे बढ़ने का जोश जगा जा
वक्त को भी थाम ले
हर काम को अंजाम दे
मिलेगी मंजिल हमें
जरा धैर्य से तू काम ले
खुद पे जरा तू कर यकीन
उम्मीद का दीप न कर मद्धिम
कदम राह खुद ढूंढ़ लेंगे
हम पायेंगे मंजिल एक दिन
तकदीर-भाग्य-नसीब हमें कितने दिन सतायेंगे
मेहनत की तलवार से सबको कदमों में लायेंगे
मेरे दिल यूं ना…

हम वंशज हैं कर्मवीर के
न रोते हैं तकदीर पे
तूफां भी हमसे डरते हैं
हम लड़ते हैं हर पीर से
ये तो ट्रेलर है गम का
पूरा सीन बाकी है फिलम का
अभी से तू घबरा गया
तो क्या होगा जीवन का
गम के बादल को चीरकर खुशी का सूरज उगायेंगे
लोग सपनों से ऊँचा उड़ते हैं हम क्या मंजिल भी न पायेंगे
मेरे दिल यूं न टूट के बिखर जा
माना कि क़ई बार मैंने हार है पाया
पर यूं न दिल तू खो हौंसला
फिर से आगे बढ़ने का जोश जगा जा…

दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं दीपिका दीप्ति हूँ बैजनाथ यादव की नंदनी, मध्य वर्ग में जन्मी हूँ माँ है विन्ध्यावाशनी, पटना की निवासी हूँ पी.जी. की विधार्थी। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।। दीप जैसा जलकर तमस मिटाने का अरमान है, ईमानदारी और खुद्दारी ही अपनी पहचान है, चरित्र मेरी पूंजी है रचनाएँ मेरी थाती। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी।। दिल की बात स्याही में समेटती मेरी कलम, शब्दों का श्रृंगार कर बनाती है दुल्हन, तमन्ना है लेखनी मेरी पाये जग में ख्याति । लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।।

2 thoughts on “दिल छू ले मंजिल

  • बहुत खूब .

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छा प्रेरक गीत !

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