कविता

बेटी को माँ की सीख

ससुराल में जाकर बेटी
माँ का संस्कार तु भूल न जाना
नित्य कर्म-धर्म करके तु
एक संस्कारी बहू कहलाना

सासुजी को माँजी कहना
ससुरजी को पिता समझना
पति को जीवन-साथी
देवर को अपना बेटा मानना

दोस्त के रुप में ननद मिलेगी
बहन रुप में जेठानी
जेठजी को भाई समझना
करना न तु मनमानी

नजर का बस फेर है बटी
वहाँ सारे परिवार मिलेंगे
सबसे तुम मिल-जूलकर रहना
सब तुम्हें अपना समझेंगे

बड़े नाजुक होते हैं रिश्ते
हरदम इसे रखना सम्हाल
मेरी दुआ तुम्हारे साथ है
हरदम खुश रहना ससुराल

प्यार लुटाना खुशियाँ बाँटना
हरपल सबका देना साथ
दु:ख में दिल को समझा देना
कभी नहीं रहना उदास

सबके दिल पर राज करोगी
जब कर्तव्य रखोगी जारी
तभी तुम कहलाओगी बेटी
एक आदर्श भारतीय नारी

— दीपिका कुमारी दीप्ति (पटना)

दीपिका कुमारी दीप्ति

मैं दीपिका दीप्ति हूँ बैजनाथ यादव की नंदनी, मध्य वर्ग में जन्मी हूँ माँ है विन्ध्यावाशनी, पटना की निवासी हूँ पी.जी. की विधार्थी। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।। दीप जैसा जलकर तमस मिटाने का अरमान है, ईमानदारी और खुद्दारी ही अपनी पहचान है, चरित्र मेरी पूंजी है रचनाएँ मेरी थाती। लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी।। दिल की बात स्याही में समेटती मेरी कलम, शब्दों का श्रृंगार कर बनाती है दुल्हन, तमन्ना है लेखनी मेरी पाये जग में ख्याति । लेखनी को मैंने बनाया अपना साथी ।।

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