कविता

चाँद

चाँदMoon
कुछ अरसे पहले ये चाँद
बेटा था मेरी नानी का
इसमें परियों का डेरा था
हिस्सा था उनकी कहानी का…..
साथ खेलते खेलते न जाने कब
साथी बन गया सपनों का
ये मेरी आँखों में चेहरा
पहचानता था अपनों का…….
आजकल ये मेरी
नानी का नाती है
परियों की लिखी
कहानी भरी पाती है…..
कल को बने शायद
नाती मेरी मां का
ये हिस्सा है सबके
कारवां का….
ये रिश्ते बदल के जीता है
हमसे ही रिश्ते लेता है
ये तो पूरा रीता है….

7 thoughts on “चाँद

  • मनोज पाण्डेय 'होश'

    बहुत खूबसूरत कविता है ।

    • Thanks

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह ! बहुत सुन्दर !!

    • Thanks

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत खूब , वाह वाह .

    • शुक्रिया हौसला बढ़ाने के लिए

      • विजय कुमार सिंघल

        टिप्पणियों का उत्तर लॉग इन करके दें तो बेहतर रहेगा.

Comments are closed.