कविता

सुनो

सोना चाहती हूँ
बस एक
पुरसुकून नींद…
कितना थकी हुई हूँ
नहीं लगा सकते
तुम अंदाजा…
हूँ कितनी सदियों से
प्यासी…
और
तुम
कितने जन्मों से
रेगिस्तान…!!

— रितु शर्मा

रितु शर्मा

नाम _रितु शर्मा सम्प्रति _शिक्षिका पता _हरिद्वार मन के भावो को उकेरना अच्छा लगता हैं

One thought on “सुनो”

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत खूब !

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