आत्मकथा : एक नज़र पीछे की ओर (कड़ी 18)
नये स.म.प्र. श्री दौलतानी
श्री एस.एन.पी. सिंह की जगह श्री अजित लाल दौलतानी हमारे स.म.प्र. बनकर आये। उनसे मेरा पूर्व परिचय था। पहले वे नदेसर (वाराणसी) शाखा के प्रबंधक थे, जब मैं वाराणसी मंडलीय कार्यालय में था। बाद में वे कानपुर आ गये थे। जब प्रोमोशन के बाद मेरी पदस्थापना कानपुर में हुई थी, उस समय भी वे कानपुर मंडलीय कार्यालय में ही वरिष्ठ प्रबंधक थे। लेकिन कुछ माह बाद ही उनका प्रोमोशन हो गया और वे मुख्य प्रबंधक बनकर किसी विभाग में प्रधान कार्यालय चले गये थे। लगभग 6 वर्ष दूर रहने के बाद वे फिर प्रोमोशन लेकर सहायक महाप्रबंधक बनकर कानपुर में ही पदस्थ हुए थे। हालांकि हम दोनों में कभी कोई घनिष्टता नहीं थी, लेकिन सामान्यतया वे मुझसे और मेरी क्षमताओं से परिचित थे। इसलिए शीघ्र ही हममें सामंजस्य हो गया। यह बता दूँ कि वे मूलतः आगरा के रहने वाले हैं और ताजगंज में उनका पैतृक मकान तथा आगरा में ही ससुराल भी है।
वैसे उनके कार्य करने की शैली अपने आप में अनोखी थी। वे अपने को दूसरों से विशिष्ट दिखाने की कोशिश करते थे। उदाहरण के लिए, सभाओं या समारोहों में दूसरे मंडलीय प्रमुख जहाँ खड़े होकर बोलते थे, वहीं वे हमेशा बैठकर ही बोलते थे। यह बात नहीं कि उनको खड़े रहने में कोई समस्या थी। वास्तव में उनका स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। लेकिन स्वयं को विशिष्ट दिखाने के लिए ही वे बैठकर बोला करते थे। उनका स्वभाव भी कुछ कठोरता लिये हुए था, इसलिए अधिकांश अधिकारी उनसे डरते थे। परन्तु उन्होंने मुझे ज्यादातर सहयोग ही किया और कभी परेशान बिल्कुल नहीं किया। मुझे वे छुट्टियाँ भी आसानी से दे देते थे।
उनकी एक आदत मुझे बहुत अप्रिय लगती थी। वे सुबह कार्यालय आते ही यह उम्मीद करते थे कि उस दिन इंटरनेट पर आने वाले समाचारपत्रों इकाॅनाॅमिक टाइम्स और फाइनेंशियल एक्सप्रेस के मुख्य-मुख्य समाचार उनको छापकर दे दिये जायें। हालांकि ये दोनों अखबार दोपहर 2-3 बजे तक कार्यालय में आ जाते थे, परन्तु वे इतनी देर यानी 3-4 घंटे भी इंतजार नहीं करना चाहते थे। इसलिए यह कार्य कु. तेजविंदर कौर कर देती थीं। मेरे विचार से यह कार्य एकदम फालतू था और इसमें एक-डेढ़ घंटे का समय तथा 20-25 पेज कागज बरबाद होता था। कभी-कभी जब कु. तेजविंदर कौर छुट्टी पर होती थीं, तो श्री दौलतानी मुझसे यह आशा करते थे कि मैं यह कार्य करके दे दूँगा, परन्तु मैंने एक दिन भी यह कार्य नहीं किया।
बैंक का आई.पी.ओ.
उन्हीं दिनों सन् 2001-02 में हमारे बैंक ने अपने शेयर पहली बार जारी किये। बैंक के शेयर की कीमत केवल 10 रु. रखी गयी थी और इसी कीमत पर बेचे जा रहे थे। इसके लिए बैंक के कर्मचारियों का कोटा भी तय था और उन्हें शेयर खरीदने के लिए ऋण भी मिल रहा था। लगभग सभी अधिकारियों ने इस ऋण सुविधा का लाभ उठाया और शेयरों के लिए एप्लाई किया। अपने बैंक के ग्राहकों में आई.पी.ओ. का प्रचार करने के लिए बैंक ने एक योजना बनायी। उसने विभिन्न शाखाओं में फिक्स डिपोजिट खाता खोलने वाले ग्राहकों या ऐसे ग्राहकों जिनके जमा खाते में कम से कम 50 हजार रुपये हों, के नाम-पतों की सूची एकत्र की। उस समय तक सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण हो चुका था, इसलिए ऐसी सूची बनाने में कोई कठिनाई नहीं थी। लेकिन गड़बड़ यह थी कि एक-एक ग्राहक और उनके परिवार के कई-कई खाते थे और उनमें पता भी एक जैसा नहीं था। इसलिए हमारी कोशिश यह थी कि एक परिवार को केवल एक पत्र भेजा जाये, जिससे कि अधिक से अधिक परिवारों में पत्र पहुँच जाये।
इससे भी बड़ी गड़बड़ यह थी कि शाखाओं के प्रबंधकों ने अपने अल्प ज्ञान के कारण वह सूची डाटाबेस फाॅर्मेट में निकालने के बजाय प्रिंट फाॅर्मेट में निकालकर भेज दी। जो सूचियाँ डाटाबेस के फाॅर्मेट में आयी थीं, उनमें से पते छापना आसान था, लेकिन जो प्रिंट फाॅर्मेट में आयी थीं, उनमें से पते निकालना जरा टेढ़ा काम था। इसके लिए मुझे एक विशेष प्रोग्राम लिखना पड़ा, जिससे छपाई के एक पूरे पेज में से केवल पते को उठाकर डाटाबेस फाॅर्मेट की फाइल बन जाती थी। यह प्रोग्राम मैंने फाॅक्सप्रो में लिखा और सफलतापूर्वक काम सम्पन्न हो गया। हालांकि लगभग 40 बड़ी-बड़ी शाखाओं का काम करने में कई दिन लग गये। मेरे इस विराट कार्य को देखकर दौलतानी जी बहुत संतुष्ट हुए थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारी इस मेहनत का पूरा फल मिला और हमारे बैंक का आई.पी.ओ. खुलने के पहले ही दिन लगभग पूरा हो गया और अन्तिम दिन तक तो कई गुने एप्लीकेशन आ गये थे।
आई.पी.ओ. के दिनों में मुझे मुख्य शाखा में जाना पड़ा था, क्योंकि वहाँ प्रोग्रामिंग करने वाला कोई नहीं था। शालू सेठ उस समय अपनी गर्भावस्था के कारण छुट्टी पर चली गयी थी। हालांकि मुझे वहाँ भेजना उचित नहीं था, क्योंकि इस कार्य के लिए मुझसे जूनियर अधिकारी उपलब्ध थे, लेकिन हमारे तत्कालीन मुख्य प्रबंधक श्री एम.आर. कुमार ने मुझे ही भेज दिया। खैर, उनके आदेश का पालन करना मेरी बाध्यता थी, इसलिए मैं चला गया और अपने दायित्व को पूरी तरह निभाया। यहाँ तक कि कई बार मुझे डाटा प्रविष्टि भी करनी पड़ी। आई.पी.ओ. का कार्य समाप्त होने के बाद मैं फिर अपने मंडलीय कार्यालय में आ गया।
आई.पी.ओ. के फार्म वैसे तो हमारे बैंक की सभी शाखाओं में लिये जाते थे, लेकिन उनको प्रोसेस केवल दो जगह किया जाता था- मुख्य शाखा में और स्वरूप नगर शाखा में। मुख्य शाखा में कम्प्यूटर का कार्य जहाँ मैंने सँभाला था, वहीं स्वरूप नगर शाखा में कु. तेजविन्दर कौर ने यह काम सँभाल लिया था।
मिशन हाईस्पीड
मैं बता चुका हूँ कि उस समय अर्थात् 2002 तक हमारे बैंक के कानपुर मंडल की लगभग सभी शाखाओं का कम्प्यूटरीकरण हो चुका था और सुचारु रूप से सारा कार्य कम्प्यूटरों द्वारा किया जा रहा था। लेकिन जब भी मैं किसी शाखा में जाता था, तो मुझे लगभग हर जगह यह शिकायत सुनने को मिलती थी कि कम्प्यूटर से रिपोर्ट छापने में बहुत समय लग जाता है और उनके रोज दो घंटे इसमें बरबाद हो जाते हैं। वास्तव में उनकी शिकायत सही थी। हमने उनको केवल डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर दिये थे, जो बहुत धीरे-धीरे छपायी करते थे और कभी कागज या रिबन फँस जाने पर उनका और भी अधिक समय बर्बाद होता था। इसलिए वे चाहते थे कि उन्हें अच्छे तेज गति वाले प्रिंटर दे दिये जायें। सौभाग्य से उन दिनों हाईस्पीड डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर उपलब्ध थे, जिनकी कीमत केवल 30-35 हजार थी। वैसे और भी अधिक गति वाले लाइन मैट्रिक्स प्रिंटर भी आने लगे थे, परन्तु उनकी कीमत 2 लाख के आस-पास थी। इसलिए हमने यह तय किया कि सभी शाखाओं को एक-एक हाईस्पीड डाॅट मैट्रिक्स प्रिंटर दे दिया जाये। ऐसा ही एक प्रिंटर हम स्वयं अपने कम्प्यूटर केन्द्र में उपयोग में लाते थे, जिससे मिनटों में सैकड़ों पेज की रिपोर्ट निकल आती थी।
श्री दौलतानी सिद्धान्ततः हमारे विचार से सहमत थे, परन्तु हाईस्पीड पिं्रटरों की अनुमति वे अपने स्तर से नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्होंने हमसे कहा कि हम प्रधान कार्यालय से इसकी अनुमति प्राप्त करें। फिर हमने प्रधान कार्यालय से पत्र-व्यवहार चालू किया। पहले तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। लेकिन जब हमने बार-बार माँग की, तो उन्होंने ये आँकड़े माँगे कि प्रत्येक शाखा में रोजाना औसतन कितने वाउचर होते हैं। जिन शाखाओं में 700 से अधिक वाउचर होते थे, उनको हाईस्पीड प्रिंटर देने पर वे सिद्धान्ततः सहमत थे, परन्तु अनुमति फिर भी नहीं मिली। लेकिन मैं भी अड़ा हुआ था। जब पत्र-व्यवहार की मात्रा बढ़ने लगी तो मैंने हाईस्पीड प्रिंटरों के बारे में पत्र-व्यवहार की एक अलग फाइल ही बना डाली और उस फाइल का नाम रखा- ‘मिशन हाईस्पीड’। धीरे-धीरे यह फाइल मोटी होती गयी। प्रधान कार्यालय द्वारा शाखाओं के वाउचरों के आँकड़े एक बार फिर माँगे गये और मैंने फिर भेज दिये।
अन्ततः करीब डेढ़ साल तक लगातार पत्र-व्यवहार करने के बाद वहाँ से हमें 20 बड़ी-बड़ी शाखाओं के लिए हाईस्पीड प्रिंटर खरीदने की अनुमति मिल गयी। मैंने तत्काल कोटेशन इकट्ठे किये और 20 हाईस्पीड प्रिंटरों का आदेश दे दिया। जब निर्धारित समय पर प्रिंटर आये और शाखाओं में लगाये गये, तो शाखाओं के लोगों ने मुझे बहुत दुआयें दी। अब उनका रोज एक-डेढ़ घंटे का कीमती समय बचने लगा था, जिसे वे अपने परिवार के साथ बिता सकते थे।
इन 20 नये प्रिंटरों में से एक हमने अपने कम्प्यूटर सेंटर के उपयोग के लिए रखा और अपना वाला प्रिंटर किसी शाखा को भेज दिया। संयोग से हमने जो प्रिंटर अपने पास रखा था, उसमें कुछ मामूली सी तकनीकी गड़बड़ी थी। वह छापता तो अच्छा था, परन्तु उसमें लगाये जाने वाले रिबन को जल्दी फाड़ देता था, जबकि दूसरे प्रिंटरों में रिबन लम्बे समय तक चलते थे। जब मैंने इसके कारण का पता लगाया, तो तकनीकी गड़बड़ी मेरी समझ में आ गयी, हालांकि मैं हार्डवेयर इंजीनियर नहीं हूँ। तब मैंने उसे सप्लाई करने वाली कम्पनी (शायद ‘लिपि’) के इंजीनियर को बुलाया और उसे गड़बड़ी ठीक करने को कहा। पहले तो वह इंजीनियर मान ही नहीं रहा था कि प्रिंटर में कोई तकनीकी खराबी है। उसके लिए इतना ही काफी था कि प्रिंटर सही छपाई कर रहा है, रिबन का जल्दी फट जाना उसके लिए कोई समस्या ही नहीं थी. लेकिन मेरे एक घंटे समझाने के बाद उसने यह तो मान लिया कि प्रिंटर में वास्तव में कोई गड़बड़ी है, लेकिन वह गड़बड़ी कहाँ पर है यह वह नहीं समझ पाया। असल में वह एक नया इंजीनियर था और उसे प्रिंटरों का रखरखाव करने का अधिक अनुभव नहीं था।
इसलिए मैंने उसकी कम्पनी को लिखा कि नये लल्लू के बजाय किसी अनुभवी इंजीनियर को भेजिए। तब उनका दूसरा बड़ा इंजीनियर आया, तो मेरे बताने पर वह समस्या को समझ गया। कहने लगा- ‘मुझे पता चल गया है कि इसमें क्या खराबी है, लेकिन मैं उसको ठीक करना नहीं जानता। किसी दूसरे को भेज दूँगा।’ फिर कई दिन बाद एक तीसरा इंजीनियर लखनऊ से आया। वह इंजीनियर वास्तव में बहुत अनुभवी था। उसने तकनीकी गड़बड़ी ठीक कर दी और फिर वह प्रिंटर अच्छी तरह चलने लगा और रिबन भी देर तक काम देने लगा.

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात ते सिल पर पड़े निशान।
aapne is kahawat ko charitaarth kar diya..
आज की कथा में वर्णित तीनों प्रसंग महत्वपूर्ण है। आपकी स्पष्टवादिता प्रशंसनीय है। आप अपने कार्य कंप्यूटर विज्ञानं / सॉफ्टवेयर के प्रामाणिक विद्वान / एक्सपर्ट हैं और साथ साथ परिश्रमी भी। अतः हर समस्या का निदान बिना समय नष्ट किये ढूंढ लेते हैं। आपके यह गुण आपके व्यक्तित्व को सुन्दर और आकर्षक बनाते हैं। आज की किश्त के लिए हार्दिक धन्यवाद।
आभार, मान्यवर !
विजय भाई , आज की किश्त भी अच्छी लगी . दरअसल यह कम्पिऊतर मेरी समझ से परे है और हैरानी होती है कि आप की इस में कितनी नॉलेज है .
धन्यवाद, भाईसाहब ! कम्प्यूटर का ज्ञान बहुत से लोगों में मुझसे भी बहुत ज्यादा है, लेकिन जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ मैं उसका अधिक से अधिक उपयोग बैंक के हित में करता हूँ। दूसरों की तरह लकीर का फ़क़ीर नहीं बना रहता। इसके लिए मैं कठोर परिश्रम से भी पीछे नहीं हटता।