कविता

बेसहारा का दर्द

खुद को ढंक रहा है एक बदन सर्द रातों में।
खोया है उसने अपनों को किन बेदर्द हालातों में।
भरपेट खाना खाकर सुकून की नींद लेने वालों।
कभी महसूस करके देखो किसी बेसहारा का दर्द बातों में।
जो फुटपाथ पर अपनी हर एक रात बितातें हैं।
एक हल्की सी आहट से ही जाग जाते हैं।
और जब पातें हैं तन्हा खुद को बेबसी की इस जंग में।
तो घुटनों से दबा के खाली पेट भूख और ठण्ड दोनों को मिटाते हैं।
सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं,बाँध लो एक डोर इनसे रिश्ते-नातों में।
कभी महसूस करके देखो किसी बेसहारा का दर्द बातों में।
रोज होती है बहस किसी की जीत तो किसी की हार है।
कभी घोटालों पर चर्चा कभी विपक्ष का पलटवार है।
जो लाचार हैं चलने से और एक-एक रोटी के लिए मोहताज हैं।
क्या देश की किसी संसद में बेसहारों के लिए भी कोई विचार है?
अगर है तो मत जलाओ मासूमों का हक जो बंद है कागजातों में।
कभी महसूस करके देखो किसी बेसहारा का दर्द बातों में।
कभी जागेगी ये सरकार ,ये इंतजार छोड़ दो।
किसी बेसहारा के लिए थोडा सा प्यार छोड़ दो।
फिर देखना उसकी एक मुस्कुराहट कितनासुकून देती है।
खून के रिश्तों से बड़ा,इंसानियत का रिश्ता जोड़ दो।
जिन्दगी का मकसद सफल हो जायेगा थाम लो एक मजबूर हाथ अपने हाथों में।
कभी महसूस करके देखो किसी बेसहारा का दर्द बातों में।
वैभव”विशेष”

वैभव दुबे "विशेष"

मैं वैभव दुबे 'विशेष' कवितायेँ व कहानी लिखता हूँ मैं बी.एच.ई.एल. झाँसी में कार्यरत हूँ मैं झाँसी, बबीना में अनेक संगोष्ठी व सम्मेलन में अपना काव्य पाठ करता रहता हूँ।

2 thoughts on “बेसहारा का दर्द

  • सतीश बंसल

    भावनाओं को अच्छी तरहा उकेरा है, विचारणीय पगश्न उठाती रचना…

    • वैभव दुबे "विशेष"

      हृदय से आभार

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