लघुकथा

लघु कथा : वात्सल्य  की ताकत

उत्तराखंड की पहाड़ियों की गोद में बसा मंदिरों का नगर ऋषिकेश धार्मिक तीर्थ स्थल है . यहीं पर मोक्षदायिनी गंगा नदी के तट से दो किलोमीटर दूरी पर ‘ सेठ महादेव  की धर्मशाला ‘ में भारत – पाक विभाजन के  रिफ्यूजी पंजाबी , हिंदू , मुस्लिम  और ईसाई आदि विभिन्न धर्म , जाति के लोग किराए पर रहते थे .

यहीं पर दो पड़ोसी  हिंदू परिवार की बीस वर्षीय नवयौवना पत्नी  गीता अपने पति गौरव  के साथ रहती थी और मुस्लिम परिवार की विधवा शबाना अपने सास – ससुर और पांच वर्षीय पुत्र के साथ रहती थी .  दोनों पड़ोसियों का आपस में घरोबा था .
एक बार शबाना के  पुत्र इकबाल ने खेल – खेल में गीता के घर  की मेज पर रखा कीमती  कांच का   फूलदान तोड़ दिया था . यह देख कर  गौरव उस नादान  बच्चे पर  क्रोधित हुआ और उसे कहा – ‘आगे से यहाँ  नहीं आना. ‘ रोते  हुए  इकबाल ने सारी बात अपनी माँ को बताई .  इस कारण  उन दोनों परिवारों में मनमुटाव और दूरियां बढती चली गई. 
 
 दिसंबर माह की  कड़कड़ाती ठंड में गीता की पहली संतान कन्या हुई . गीता ने प्रसव के कुछ दिनों बाद  सुबह की गुनगुनाती धूप में  बिटिया की  मालिश कर कपड़े में लपेट कर धूप लेने के लिए आँगन में बिछी खाट पर सुलाकर काम में लग गई . 
 
 तभी तंदूर लगाते  शबाना ने देखा कि  एक मोटा बंदर उसकी बेटी को खाने की पोटली समझ  उठाकर छत की मुंडेर पर जाकर बैठ गया . मुंडेर की बाएं  ओर छत थी और दाएं ओर खाईं . भयावह दृश्य देख शबाना का मातृत्व प्रेम जागा, अपना काम छोड़  और अल्लाह से उसकी  सुरक्षा , बचाने की इबादत करने लगी .शंका और कुविचारों ने उसे घेर लिया . सोचने लगी कि  बंदर के हाथों उस नन्हीं जान की मृत्यु निश्चित है .कहीं  उसे काट न ले,या फिर   उसे दाएं तरफ छोड़ दे तो खाईं में गिर जाएगी .
 तभी   उसे इन अँधेरे क्षणों में उजाले की  किरण  दिखी, वहीं पास में रखी तंदूरी रोटियां  और लकड़ी लेकर छत पर आई और बंदर की ओर रोटियां फेंकने लगी .  बंदर उसे छत पर छोड़ रोटी खाने में तल्लीन हो गया . तभी फुर्ती से  उसने लकड़ी  से यम रूपी बंदर को भगाया . बिटिया को छाती से लगा  अल्लाह का  शुक्रिया किया . मौत  और जीवन के इन संघर्षों में ईश बनी कर्त्तव्यपरायण शबाना ने जीवनदान दे गीता को उसकी अमूल्य निधि सौंपी .  ऋणी गीता  और गौरव  के आँखों में खुशी के  आँसू छलछलाए , उसके वात्सल्य प्रेम के तप से मौत भी हार के स्वाहा हो गई .
 
शबाना ने मजहब  , जाति ,  भेदभाव , धर्म की दीवारों  को  ढह दिया .   मनों की दूरियां मिट गईं . अच्छाई के धर्म ने  कड़वड़ाहट  को मैत्री में बदल दिया  . दुर्गा की शक्ति बन , सृष्टि की निपूर्णता , वात्सल्य प्रेम की मन्दाकिनी – सी शबाना मानवता   की प्रेरणास्रोत बन गई .
      

मंजु गुप्ता

जन्म : २१. २. १९५३ , ऋषिकेश , उत्तरांचल शिक्षा : एम.ए ( राजनीति शास्त्र ) , बी.एड शिक्षण : हिंदी शिक्षिका, जयपुरियार सीबीएससी हाईस्कूल, सानपाड़ा नवीमुंबई संप्रति : सेवा निवृत मुख्य अध्यापिका , श्री राम है स्कूल , नेरूल , नवी मुंबई। कृतियाँ :प्रांतपर्वपयोधि काव्य,दीपक नैतिक कहानियाँ,सृष्टि खंडकाव्य,संगम काव्य अलबम नैतिक कहानियाँ , भारत महान बालगीत सार निबंध,परिवर्तन कहानियाँ। प्रेस में : जज्बा ( देश भक्ति गीत ) रुचियाँ : बागवानी , पेंटिंग , प्रौढ़ शिक्षा और सामाजिकता प्रकाशन : देश - विदेश की विभिन्न समाचारपत्रों ,पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। उपलब्धियां : समस्त भारत की विशेषताओं को प्रांतपर्व पयोधि में समेटनेवाली प्रथम महिला कवयित्री , मुंबई दूरदर्शन से सांप्रदायिक सद्भाव पर कवि सम्मेलन में सहभाग , गांधी जीवन शैली निबंध स्पर्धा में तुषार गांधी द्वारा विशेष सम्मान से सम्मानित , माॅडर्न कॉलेज वाशी द्वारा सावित्री बाई फूले पुरस्कार से सम्मानित , भारतीय संस्कृति प्रतिष्ठान द्वारा प्रीत रंग में स्पर्धा में पुरस्कृत , आकाशवाणी मुंबई से कविताएँ प्रसारित , विभिन्न व्यंजन स्पर्धाओं में पुरस्कृत, दूरदर्शन पर अखिल भारतीय कविसम्मेलन में सहभाग । सम्मान : वार्ष्णेय सभा मुंबई , वार्ष्णेय चेरिटेबल ट्रस्ट नवी मुंबई , एकता वेलफेयर असोसिएन नवी मुंबई , मैत्री फाउंडेशन विरार , कन्नड़ समाज संघ , राष्ट्र भाषा महासंघ मुंबई , प्रेक्षा ध्यान केंद्र , नवचिंतन सावधान संस्था मुंबई कविरत्न से सम्मानित , हिन्द युग्म यूनि कवि सम्मान , राष्ट्रीय समता स्वतंत्र मंच दिल्ली द्वारा महिला शिरोमणी अवार्ड के लिए चयन आदि। संपर्क :19, द्वारका, प्लॉट क्रमांक 31, सेक्टर 9A वाशी, नवी मुंबई400703 भारत . फोन : 022 - 27882407 / 09833960213 ई मेल : writermanju@gmail.com