ऊबड़-खाबड़ रास्ते
इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया
उठकर गिरना और फिर गिरकर उठना सिखा दिया
इन रास्तों पर बहुत बार गिरी हूँ मैं,
इन रास्तों ने फिर गिरकर सँभलना सिखा दिया
इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।
कदमों को बढ़ना और बढ़कर रुकना सिखा दिया
सूरज के साथ उगना और उसी के साथ ढलना सिखा दिया
परिस्थितियाँ चाहें जैसी भी हों
इन्होंने बरसात में भीगना और धूप में जलना सिखा दिया
इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।
दूरियों से छलना फिर दूरियों को छलना सिखा दिया
राहों को जीवन और जीवन को राहों में बदलना सिखा दिया
चोट चाहें जैसी भी लगी हो यहाँ
जीवन के हर दर्द पर मलहम मलना सिखा दिया
इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।
राह पार कर उसे मंज़िल में बदलना सिखा दिया
हर साँस अपनी देके, नई साँस को पलना सिखा दिया
दुनिया की राह में स्वयं को
फूल बनके खिलना और फल बनके फलना सिखा दिया
इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों ने मुझे चलना सिखा दिया।
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प्रिय सखी नीतू जी, सच है, हम सीखना चाहें, तो ये ऊबड़-खाबड़ रास्ते भी हमें बहुत कुछ सिखाते हैं.
जी सही है।
शुक्रिया
बहुत अच्छी कविता, नीतू जी !