संस्मरण

मेरी कहानी 110

इन गुरुओं को मिल कर मैं हैरान था कि इतनी लूट वोह भी बड़ी इज़त के साथ हो रही थी। लोग दिल खोल कर पैसे देते और साथ ही गुरु जी को माथा टेकते। मुझे तो यह ऐसे महसूस होता था जैसे लोग बेनती कर रहे हों कि प्लीज़ हमें लूट लो, कितनी कमज़ोर मानसिकता थी। यही लोग किसी अच्छे काम के लिए दान देने से कतराते थे लेकिन बाबे संतों के आगे बटुए ढेरी कर देते थे। यूं तो मैं कुलवंत को पहले ही ऐसी बातें बताता रहता था ताकि वोह और औरतों की बातें सुन सुन कर अंधविश्वासी ना हो जाए क्योंकि कुलवंत के पिता जी ऐसे विचारों के धारणी थे और माता पिता के संस्कार बच्चों में ख़ास कर लड़किओं में आ ही जाते हैं। उस दिन महाराज जी के सामने हम बैठे तो थे लेकिन अपने उस दोस्त की वजह से ही किओंकि उस का विशवास था कि कुलवंत को महाराज जी सौ फी सदी ठीक कर देंगे और अगर हम ना जाते तो वोह दोस्त हम से गुस्सा हो जाते, लेकिन इस के बाद मैंने कभी भी किसी बाबा जी या माहत्मा के दर्शन नहीं किये, मुझे इन लोगों से इतनी नफरत हो गई थी कि इन लोगों को देखना भी नहीं चाहता .

उन दिनों मैं लाएब्रेरी से किताबें बहुत लाया करता था और हम पती पत्नी दोनों इन को पड़ कर विचार किया करते थे . मैं तो शुरू से ही नास्तिक जैसा था ( डब्बल स्टैंडर्ड की मुझे आदत नहीं है, जो मैं हूँ वोह ही बोलता हूँ ),अब कुलवंत भी यह सब पाखंड समझने लगी थी .किओंकि कुलवंत को ज़िआदा औरतों से ही मिलना होता है और वोह ज़िआदा तर अन्धविश्वासी ही होती हैं, इस लिए वोह उन की हाँ में हाँ मिला देती है, कहती कुछ नहीं, लेकिन जब टीवी पर बाबे संतों की बात आती है तो गुस्से में बहुत कुछ बोलती रहती है . उस का सिर्फ एक ही विशवास है कि भगवान् है और उस से डरना चाहिए, वोह गुरदुआरे जाती है, बस बाबा जी को सच्चे मन से माथा टेक देती है,कभी कभी सखिओं के संग कोई शब्द भी गा लेती है और इस के बाद लंगरखाने में खाना बनाने में मदद करना और सखिओं के साथ गप्पें मारना ही उस का शुगल है। अगर वोह अंधविश्वासी हो जाती तो मेरी सरदर्दी बढ़ जाती। इस का फायदा और भी हमें हुआ कि हमारे बच्चे भी इन बातों से कोसों दूर हैं। इंगलैंड में ज्योत्षी बाबे रेडिओ पर ऐड देते हैं और लोग जाते हैं। पहले पहले मैं लोगों में जाग्रुप्ता लाने के लिए रेडिओ पर कहानीआं भेजा करता था लेकिन अब वोह ही रेडिओ जियोत्शिओं बाबाओं की ऐड नशर करता है, इस लिए मैंने ऐसी कहानीआं लिखना बंद कर दिया है क्योंकि मैं समझता हूँ, यह अंधविश्वास बंद नहीं होगा क्योंकि जो हम भारती लोगों को पैदा होते ही अंधविश्वास का इंजैक्शन लगा हुआ है, वोह हम सभी के खून में दौड़ रहा है।

ज़िंदगी फिर से पटरी पर आ गई थी और बच्चे बड़े हो रहे थे. अब दिनबदिन इंडियन पाकिस्तानी लोगों की संख्य भी बढ़ रही थी ख़ास कर अफ्रीका से आये लोग। जो सिख अफ्रीका से आ रहे थे उन में ज़्यादा लोग पगड़ी बांधते थे और शायद ही उन में से किसी ने बाल कटवाए हों। अफ्रीका से आये लोगों में पड़े लिखे लोग बहुत थे जो गर्व से पगड़ी रखते थे और उन की पगड़ी का स्टाइल इंडिया से आये लोगों से भिन्न था। पहले इंडिया से आये लोग आते ही बाल कटवा लेते थे क्योंकि गोरे नफरत करते थे लेकिन अफ्रीका से आये सिखों को देख कर भारती सिख भी अब पगड़ी रखने लग गए थे। हमारे लोगों की संख्य दिनबदिन बढ़ रही थी और गोरे लोगों की नफरत भी हम से बढ़ रही थी। दो साल पहले 1972 में युगंडा से बहुत लोग आ गए थे क्योंकि उन को ईदी अमीन ने निकाल दिया था। इस का भी एक कारण था।

कुछ बातें युगंडा में अपने लोगों के बारे में लिखना चाहूंगा। भारत की तरह युगंडा भी अंग्रेज़ों के अधीन था और यह 1962 में आज़ाद हुआ था। युगंडा में एक रेलवे लाइन बनाने के लिए 1896 से 1901 तक अंग्रेज़ों ने भारत से 32000 भारती बुलाये थे। रेलवे लाइन बन गई लेकिन इस के लिए हमारे लोगों को बहुत बड़ी कुर्बानीआं देनी पड़ीं। इस में 2500 सौ भारती मारे गए थे क्योंकि यह सारा इलाका जंगल ही था और शेर चीते बहुत थे जो लोगों को खा जाते थे। कहते हैं कि हर एक मील रेलवे ट्रैक बनाने में चार भारती शहीद हुए थे। रेलवे बन जाने के बाद भारती वहां ही रह गए और काम करने शुरू कर दिए। ज़्यादा लोग गुज़रात और पंजाब से ही थे जिन में मुसलमान सिख और हिन्दू ही ज़्यादा थे और उन की आपसी सद्भावना भी बहुत थी क्योंकि सभी ने अंग्रेज़ों के लिए कुर्बानीआं दी थीं। अफ्रीकन लोग तो जंगली ही थे, और हमारे लोगों के बच्चे भारत से आते ही स्कूलों में पड़ने लगे, समय के साथ साथ कालज यूनिवर्सटीआं बनने लगीं, गुरदुआरे मंदर मस्जिद बनने लगे और हमारे लोगों ने बड़े बड़े बिज़नेस और शुगर फैक्ट्रियां ऐस्टैबिश कर लीं लेकिन युगंडा के अफ्रीकन लोग अनपढ़ ही रहे जिन को अपने ही लोगों ने एक्सप्लॉएट किया, उन को घरों में नौकर रखते थे, उन से हर काम करवाते थे और तन्खुआह बहुत कम देते थे।

1962 में युगांडा आज़ाद हुआ और इस के पहले प्रेज़िडेंट मिल्टन अबूटे बने। ईदी अमीन ने जो उस वकत मिलिटरी का कमांडर इन चीफ था, उस ने अबूटे को शायद 1971 में इस कुर्सी से हटा कर खुद मिलिटरी रूलर बन गिया। उस वक्त अबूटे सिंघा पुर को कॉमनवैल्थ कांफ्रेंस अटैंड करने के लिए गिया हुआ था। अब अमीन मन मर्ज़ी से हकूमत कर रहा था। हमारे एशियन लोग बहुत बड़े बड़े बिज़नेस मैन थे। 1972 में उन्होंने कंपाला में एक बहुत बड़ी पार्टी की जिस में बिदेशों से बड़े बड़े लोग बुलाये गए और ईदी अमीन को ख़ास कर गैस्ट ऑफ औनर के तौर पर बुलाया गिया। इस पार्टी में एक बहुत बड़ा पाकिस्तानी बिज़नेस मैंन जिस का होटल बिज़नेस था, भी अपने घर के सभी सदस्यों के साथ आया, जिस में उस की एक खूबसूरत लड़की भी थी। ईदी अमीन को यह लड़की भा गई और उस ने अपने बॉडी गार्ड को उस आदमी के पास भेजा कि वोह उस की बेटी के साथ शादी करना चाहता है, (ईदी अमीन की पहले भी चार बीवीआं थीं ). यह सुन कर वोह शख्स घबरा गिया और बॉडी गार्ड को जवाब दिया कि वोह अपने घर के सदस्यों से बात करके जवाब देगा लेकिन उस ने उसी वक्त गुप्त तरीके से सभी औरतों को कैनिया की राजधानी नैरोबी भेज दिया। अमीन को इस बात से बहुत गुस्सा आया और कुछ दिन बाद सभी एशियन को तीन महीने के बीच युगांडा छोड़ने का आर्डर दे दिया। बहाना उस ने यह बनाया कि रात को उस को एक सपना आया था जिस में अल्ला ने उस को कहा था कि यह एशियन लोग अच्छे लोग नहीं हैं, यह हमारे देश को लूट रहे हैं और हमारे लोगों को गरीब कर रहे हैं।

बस फिर किया था, एशियन लोगों में हफरा दफरी मच गई क्योंकि अमीन ने यह भी आर्डर दे दिया कि सिर्फ दो सूट केस और 55 पाउंड अपने साथ ले जा सकते थे .एक रिपोर्टर ने अमीन से पुछा था कि अगर यह लोग नहीं गए तो वोह किया करेगा, अमीन ने इस का जवाब दिया था, ” they will be sitting on fire”. उस वक्त जो हाल हमारे लोगों का एअरपोर्ट पर किया गिया, उस की दास्तान ही रूह कंपा देने वाली है, औरतों के बाल खोले गए किओंकि कुछ औरतें अपने बालों में गहने छुपा कर ले जा रही थीं, कई लड़किआं गुम हो गईं, एअरपोर्ट के कर्मचारीओं ने जी भर कर लूटा। उस वक्त 50,000 एशियन ब्रिटिश पासपोर्ट होल्डर थे और इंगलैंड में टोरी पार्टी की हकूमत थी और प्राइममिनिस्टर लॉर्ड होम था। अब दस हज़ार लोगों ने इंगलैंड के लैस्टर शहर में ही आना था. पार्लिमेंट के बहुत टोरी मैम्बर बोल रहे थे कि यह हमारे लोग नहीं हैं।

उधर भारत की प्राइममिनिस्टर इंद्रा गांधी ने भी दो टूक जवाब दे दिया था कि india is not a dumping ground . भारत की हकूमत ने अपने शहरी लेने के लिए शिप भेज दिया था। बहुत लोग अमरीका कैनेडा और कुछ अन्य यूरपी देशों को चले गए। यहां इंगलैंड के लेस्टर शहर में गोरे लोग मुजाहरे कर रहे थे कि एशियन लोगों को ना आने दिया जाए। लेकिन प्राइममिनिस्टर लॉर्ड होम ने कह दिया था कि यह लोग उन के शहरी थे, इस लिए उन का वैलकम करेंगे। इंगलैंड की हकूमत ने भारत की हकूमत को कुछ देर के लिए अपने ब्रिटिश सिटिज़न लेने की बेनती की और उस का खर्च भी देने को बोल दिया। इस के तहत बहुत लोग भारत आ गए जो धीरे धीरे इंगलैंड आने थे, इन में हमारी बहु के मामा जी भी थे। एक साल बाद जब उस को इंगलैंड आने की इजाजत मिली तो उस ने बताया कि जो पैसे अँगरेज़ हकूमत ने भारती हकूमत को उन के सिटिज़न लेने के लिए दिए थे, किसी शरणार्थी को नहीं दिए गए और उन को बहुत बुरे हालातों में रहना पड़ा था।

धड़ा धड़ जहाज़ों के जहाज़ भर भर के इंग्लैण्ड की एयरपोर्टों पर लैंड होने लगे। अंग्रेज़ों ने उन की बहुत मदद की। गोरी लड़किआं बच्चों को गोद में उठाये औरतों के साथ चलती। रहने के लिए सभी का इंतज़ाम किया और उन को हर हफ्ते पैसे देने शुरू कर दिए। पार्लिमेंट में भी बहुत गर्म बहस होती थी लेकिन लॉर्ड होम ने कहा था, कुछ देर की बात ही है, these people will not be a burdan on us और उस की यह बात सही साबत हुई क्योंकि सभी लोग सकिलड थे जल्दी ही काम पर लग गए। गुजराती लोगों ने दुकाने खड़ी कर दीं और बहुत से दूसरे बिज़नेस शुरू कर दिए क्योंकि उन लोगों में ज़्यादा लोग बिज़नेस मैन ही थे और बहुत लोगों के पैसे पहले ही इंगलैंड की बैंकों में थे, यही बात अमीन कहता था कि एशियन लोग युगांडा को लूट रहे हैं। बात को और लम्बी ना करूँ, इस वक्त लेस्टर पर गुजराती लोगों का बोल बाला है, बड़ी बड़ी शानदार दुकानें हैं और दूर दूर से इंडियन औरतें लेस्टर को कपडे खरीदने जाती हैं और वहां के गुजराती रेस्टोरेंटों में गुजराती खाने का मज़ा लेती हैं और घर भी ले कर आती हैं।

लेकिन इस अचानक इमिग्रेशन का इतना बुरा असर हुआ था कि उस समय गोरे लोग हम लोगों से बहुत चिढ़ते थे। अभी चार साल पहले ही तो इनोक पावल ने हलचल मचाई हुई थी और अब युगांडा से और एशियन आ गए थे। यह इमिग्रेशन का मसला आज तक उसी तरह चलता आ रहा है और अब तो इतने लोग आ गए हैं कि जो युगांडा से आये थे वोह तो कुछ भी नहीं थे। आज हम इंग्लैण्ड में सैटल हो चुक्के हैं लेकिन सच्चाई यह भी है कि अंग्रेज़ों ने दिल से हमें कभी सवीकारा ही नहीं, हम यहां रह रहे हैं, हमें बराबर के अधिकार हैं, हमारे पार्लिमेंट में मैम्बर हैं और मेयर तो बहुत शहरों में रह चुक्के हैं और अभी भी हैं, इंग्लैण्ड की अर्थविवस्ता में हमारा बहुत बड़ा योगदान है लेकिन फिर भी हम अपने आप को गोरों से इलग्ग महसूस करते हैं। अगर इन बातों का मुकाबला मैं भारत से करूँ तो डिस्क्रिमिनेशन भारत में इस से भी बहुत ज़्यादा है क्योंकि हज़ारों सालों से दलित आदिवासी इस डिस्क्रिमिनेशन का सामना कर रहे हैं, ऐसा इंग्लैण्ड में नहीं है। भारत में तो जात पात का कोहड़ ही नहीं खत्म हो सका। आपस में शादियां ही नहीं करवा सकते, दाज की लानत, बहु को तंग करने की लानत, बहु को बेटा पैदा ना करने पर दुःख देने की लानत, किया किया लिखूं, इन सभी बातों को धियान से देखूं तो लगता है इतनी मिहनत मुश्कत और गोरे लोगों की हम से नफरत के बावजूद हम इंगलैंड में ज़्यादा सुरक्षित हैं।

चलता. . . . . . . . . . .

2 thoughts on “मेरी कहानी 110

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    लीला बहन , बहुत बहुत धन्यवाद . बस यह सब आप की प्रेरणा से ही संभव हो सका है .

  • लीला तिवानी

    प्रिय गुरमैल भाई जी, क्या चुन-चुनकर शब्द लिखे हैं, आपने! कमज़ोर मानसिकता. भाई, यह तो अब केवल आत्मकथा न रहकर इतिहास भी बन गया है. हज़ारों सालों बाद भी यह आत्मकथा कोई पढ़ेगा, तो इतिहास में आपके नाम का हवाला दिया जाएगा. अति सुंदर, अति अद्भुत.

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