कविता

नन्हा कान्हा

जब तू खिलखिला कर हँसता है
सोचती हूँ…..
तेरी किलकारियों मे ही
विद्यमान होते हैं
सातों स्वर !
मासूमियत,चंचलता,कोमलता
तेरी भोली भाली बातों से
अठखेलियाँ करतीं
तेरी तोतली बातों संग नाचती हैं तो
घर का आँगन बन जाता है मधुबन!
तेरी नटखट आँखों की करामात देखना
तेरे कोमल हाथों की जादुई छुअन
काट देती है मेरे कष्ट !
हर लेती है जीवन की
अनकही पीड़ा !
मेरे जानबूझकर रूठ जाने पर
तेरे प्यार की झड़ी
बिखेर देती है हरियाली
जिंदगी के बंजर टुकड़े पर !
दिव्य आलोक फैल जाता है जब
मुख को गोल घुमा तोतले बोल मे जब बोलता है “माँ !!!”
तेरे छोटे से मुंह मे सिमट जाता है ब्रहमाण्ड !
और लफ़्ज माँ मे सिमट जाती है
मेरी दुनिया !!
सोचती हूँ तेरे बेतरतीब बोलों मे ही
छुपा हैं कहीं शायद
सभी ग्रंथों का सार!!
मधुबन मे स्नेह रस से भरे
फूल कलियाँ चुनती
मै बागो बहार हो उठती हूँ
मन्त्र मुग्ध हुई मैं
“मेरे नन्हें कान्हा !!!”
सोचती हूँ
तेरा मेरे जीवन मे होना
उस सृजनकर्ता प्रभु की
प्रत्यक्षता का ही तो प्रमाण हैं !
****रितु शर्मा ****

रितु शर्मा

नाम _रितु शर्मा सम्प्रति _शिक्षिका पता _हरिद्वार मन के भावो को उकेरना अच्छा लगता हैं