गीतिका/ग़ज़ल

उठ रहा बिन आग के ही जब धुआं क्या कीजिये।

उठ रहा बिन आग के ही जब धुआं क्या कीजिये।
वहम की होती नही कोई दवा क्या कीजिये॥

धडकनें तो आज भी आवाज देती हैं मगर।
सुनके भी करदे कोई जब अनसुना क्या कीजिये॥

पत्थरों के शहर को दिखला रहे थे आईना।
बुत परस्ती को न भाई ये अदा क्या कीजिये॥

था मेरा हमराज कल तक हमसफर था वो मेरा।
दौर-ए-गर्दिश में हुआ हमसे जुदा क्या कीजिये॥

जिनके सीने में कोई अहसास ही बाकी न हो।
रहम की उम्मीद फिर उनसे भला क्या कीजिये॥

चल रहा है हर कदम डर डर के सहम सहम कर।
छाछ से डरता है दूध का जला क्या कीजिये॥

खत्म कर डाला मेरे अपनो ने ही जब सिलसिला।
फिर भला गैरों से शिकवा और गिला क्या कीजिये॥

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.