वैदिक वर्ण-व्यवस्था बनाम् जन्मना-जाति सामाजिक व्यवस्था
ओ३म्
वर्तमान में आर्यों व हिन्दू समाज में जन्मना जाति व्यवस्था प्रचलित है। इस सामाजिक व्यवस्था का यह स्वरूप वैदिक वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप है। यह विकार मुख्यतः महाभारत काल के बाद शनैः शनैः उत्पन्न हुआ और मध्यकाल में सर्वाधिक विकृत हुआ जब गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित वर्णव्यवस्था समाप्त होकर इसका स्थान गुण-कर्म व स्वभाव से रहित जन्मना जातीय व्यवस्था ने ले लिया। यह एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि मनुष्य के उत्थान की कोई सीमा नहीं है, राम, कृष्ण, दयानन्द एवं पूर्व के हमारे सभी ऋषि, मुनि योगी, चिन्तक, विचारक व वेदज्ञ विद्वान व ज्ञानी थे। दूसरी ओर मनुष्य के पतन की भी कोई सीमा नहीं है। मनुष्य कितना गिर सकता है इसका उदाहरण आजकल के शिक्षित आतंकवादी हैं जो राजनैतिक, धामिक स्वार्थों व कारणों से निर्दोष सज्जन एवं परोपकारी देशभक्त लोगों की हत्या जैसा घृणित व जघन्य पाप का कार्य धर्म के नाम पर करते हैं। इससे अधिक और पतन मनुष्य का क्या हो सकता है? संसार में सभी मतों, अज्ञान व स्वार्थ पर आधारित धार्मिक व सामाजिक संगठनों का आविर्भाव अज्ञान, अविद्या व स्वार्थों के कारण हुआ है। सबसे बड़ी अविद्या तो यह है कि आज लोग अपनी-अपनी मुर्खतापूर्ण अविद्या की बातों पर भी अभिमान करते हैं, उनके सत्यासत्य होने का विचार नहीं करते और केवल भौतिक सुख साधनों को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनायें हुए हैं।
हमारा संसार विदेशी मत व मान्यताओं के अनुसार कोई 2-3 से 5 या 10 हजार पुराना बना हुआ नहीं है अपितु इसे बने हुए 1,96,08,53,116 वर्ष हो चुके हैं। यह मान्यता वैदिक व सनातन धर्म की है। सृष्टि की वर्तमान आयु व अवधि का निर्धारण विगत पांच से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व उत्पन्न मत मतान्तर नहीं कर सकते। यह ज्ञान तो सृष्टि के आदि में आविर्भूत मत ही बता सकता व सिद्ध कर सकता है। सुखद बात है कि आज के वैज्ञानिकों ने भी सृष्टि को वैदिक मत के अनुरुप करोड़ों व कईयों ने 1 अरब से 2-3 अरब वर्ष पुराना होना स्वीकार किया है जिससे वैदिक मत की पुष्टि व इतर मत-मतान्तरों की मान्यताओं का खण्डन होता है। अब प्रश्न यह है कि सृष्टि कैसे बनी तो इसके लिए संसार के साहित्य का अध्ययन करना उचित होता है। सृष्टि के निर्माण व रचना का वर्णन वेदों व वैदिक साहित्य में विस्तार से हुआ है। संसार वेद को सबसे पुरानी पुस्तक व ज्ञान स्वीकार करता है। वैदिक मान्यता है कि वेद सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को सृष्टि में व्यापक, चेतन, आनन्द से युक्त, सर्वज्ञ, अनादि, नित्य, सनातन सत्ता ईश्वर से प्राप्त ज्ञान है। ईश्वर ने ही इस सृष्टि की रचना अनादि सूक्ष्म कारण सत्व, रज व तमों गुणों वाली प्रकृति से अपनी सर्वज्ञता व सर्वशक्तिमत्ता के गुण का उपयोग करके की है जिसका उद्देश्य जीवों को पूर्व कल्प वा पूर्वजन्मों के कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल देना है। सृष्टि की रचना करने के बाद अमैथुनी सृष्टि में स्त्री व पुरुषों को भी युवावस्था में ईश्वर ने ही उत्पन्न किया। सृष्टि की रचना व मनुष्यों सहित अन्य सभी प्राणियों की रचना केवल ईश्वर ही कर सकता है। अन्य कोई कारण व कर्ता संसार में नहीं है। यह भी तथ्य व सिद्धान्त है कि कोई भी बड़ी व छोटी बुद्धिपूर्वक रचना बिना किसी ज्ञान से पूर्ण चेतन सत्ता के किसी भी अवस्था में सम्भव नहीं है। सृष्टि की रचना और मनुष्यादि प्राणियों की उत्पत्ति, यह दोनों कार्य अपौरुषेय होने के कारण मनुष्यों का सामर्थ्य इनके करने व रचना में नहीं है। अतः ईश्वर से ही सृष्टि की रचना व इसका पालन सहित जीवों को नाना प्राणी योनियों में जन्म के साथ मनुष्यों को वेदों का ज्ञान तथा अन्य प्राणियों को जीवन व्यतीत करने के लिए आवश्यक स्वभाविक ज्ञान ईश्वर से ही मिलता है व मिलता आ रहा है।
सृष्टि के आरम्भ में ऋषियों को ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हुआ। वेदों का वह ज्ञान मन्त्रों में है तथा छन्द एवं स्वरों से युक्त है। इन सभी मन्त्रों के अर्थ भी ईश्वर की कृपा द्वारा ऋषियों को विदित हुए थे। अब वैदिक ज्ञान के अनुसार ऋषियों को समाज का निर्माण करना था। आगे चल कर जनसंख्या में वृद्धि व उसके भौगोलिक विस्तार का ज्ञान भी तत्कालीन ऋषियों को था। ऋषि कहते ही उसे हैं जिनमें अन्य गुणों के अतिरिक्त कारण-कार्य के सिद्धान्त के अनुसार दूरद्रष्टा होने का गुण होता है। अतः ऋषियों ने समाज की आवश्यकता के अनुसार वेदों के मार्गदर्शन में जिस सामाजिक व्यवस्था को जन्म दिया उसे ही वर्णव्यवस्था कहा जाता है। वर्ण का अर्थ चयन करना है। प्रत्येक मनुष्य अपने गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार ही स्तुति-प्रार्थना-उपासना सहित भौतिक वस्तुओं का चयन भी करता है। अतः ऋषियों ने वेद मन्त्रों के ज्ञान के आधार पर गुण-कर्म-स्वभाव के आधार पर वर्णव्यवस्था का प्रचलन कराया। समाज व मनुष्य की तीन प्रमुख आवश्यकतायें ज्ञान वा विद्या, रक्षा वा सुरक्षा और साधनों की आवश्यकता के अनुसार उपलब्धता सर्वकालिक हैं। अतः समाज से अज्ञान दूर कर विद्या का प्रकाश करने वालों को ब्राह्मण वर्ण दिया गया जो गुरुकुलों में आचार्यों से अध्ययन पूरा करने के पश्चात वरण करने एवं राजकीय व्यवस्था के अनुसार आचार्य द्वारा प्रदान किया जाता था। आज भी हमारे यहां जो अध्यापक, आचार्य, प्रोफेसर, ज्ञानी व वैज्ञानिक जिनमें इंजीनियर व डाक्टर आदि भी सम्मिलित हैं एवं वेद प्रचारक, यज्ञ द्वारा परोपकार करने वाले तथा दानी जन हैं, वह सभी ब्राह्मण वर्ण के अन्तर्गत कहे जा सकते हैं। देश, काल परिस्थितयों के अनुसार इनमें न्यूनाधिक हो सकता है परन्तु वर्तमान में भी जन्म लेने वाला मनुष्य बिना ज्ञान प्राप्ति के निर्वाह नहीं कर सकता। अतः आचार्य, विद्वान एवं सत्य के ज्ञानियों व प्रचारकों की आवश्यकता आज भी निर्विवाद है। आज सारा संसार ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति से सम्बन्धित यथार्थ ज्ञान से दूर अज्ञान में प्रायः आबद्ध है। न आज के शिक्षितों को ईश्वर के स्वरूप व उसके प्रति अपने कर्तव्य का ज्ञान है और न आत्मा का ज्ञान व उसके सुख-दुःख के कारण शुभ-अशुभ कर्मों का ही सम्यक ज्ञान है। सृष्टि का उपयोग किस प्रकार किस सीमा तक करना है, इससे भी संसार के लोग आज अपरिचित हैं। इनका ज्ञान केवल वेद और वैदिक साहित्य के अध्ययन व आचरण से मिलता है परन्तु पाश्चात्य आचार-विचार एवं मत-मतान्तरों की शिक्षा ने आज की युवा एवं प्रौढ़ पीढ़ी को अन्धकार से ग्रसित कर रखा है। इनसे दूर निकलने का उपाय केवल वैदिक ज्ञान व उसका आचरण ही है जो गुरुकुल के अध्ययन के साथ वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से प्राप्त होता है।
समाज के प्रत्येक प्राणी को रक्षा व सुरक्षा की आवश्यकता है। इसका नियन्त्रण व अनुशासन क्षत्रिय वर्ण के द्वारा किया जाता था जो राज्य के नियमों के अन्र्तगत क्षत्रिय वर्ण के लोग करते थे जो वेदों के ज्ञानी होने के साथ रक्षा के कर्मों को करते हुए ईश्वरोपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र आदि पंच महायज्ञों को सम्पन्न करने के साथ स्वाध्याय व ऋषि-मुनियों व विद्वानों का सत्संग व संगति आदि करते रहते थे। आजकल हमारी सेनायें एवं सुरक्षा बल सहित आन्तरिक व्यवस्था के लिए पुलिस जिसे हम हिन्दी में रक्षक कह सकते हैं, का मुख्य कर्तव्य सबको सुरक्षा प्रदान करना होता था। यह क्षत्रिय वर्ण के लोग धर्म अर्थात् वैदिक कर्तव्यों का आचरण करते हुए ब्राह्मणों व उनके ब्रह्मचारियों को दान आदि के सहयोग से सन्तुष्ट रखते थे। सभी वर्णों में परस्पर प्रेम व सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध होता था। तीसरा वर्ण वैश्य के नाम से जाना जाता है। वैश्य का कार्य सभी मनुष्यों की आवश्यकताओं की वस्तुओं की पूर्ति करना होता था। यह भी गुरुकुलों में वेद एवं अन्य सभी विद्याओं के साथ कुषि, गोपालन एवं वाणिज्य का विशेष रूप से अध्ययन करते थे तथा योग्यता प्राप्त कर वैश्य वर्ण का वरण करते थे जो आचार्यों द्वारा समावर्तन संस्कार के समय उन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदान किया जाता था। कृषि कार्य, गोपालन व सभी प्रकार के वाणिज्य के कार्य वैश्य वर्ण के लोग करते थे तथा अन्य तीनों वर्णों से परस्पर प्रेम व समान व एक मन वाले होकर रहते थे। चैथा वर्ण वह होता था जो गुरुकुल के वेद एवं वैदिक साहित्य के अध्ययन में पूर्णतया समर्थ व सफल न होकर किंचित कमजोर व अन्यों की तुलना में असफल रहता था। उसे श्रम करने अर्थात् अन्य वर्णों के कार्यों में सहायता करने का कार्य दिया जाता था और उसका नामकरण शूद्र वर्ण से किया गया था। शूद्र वर्ण के लोग प्रसन्नता से ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य वर्ण के लोगों को उनके सभी कार्यों में अपनी सेवा आदि कार्यों के द्वारा सहयोग करते थे। जिस प्रकार शरीर में आंख, नाक, कान, मुंह, जिह्वा, हाथ, पैर, उदर व शरीर के अन्दर फेफड़े, हृदय, यकृत व आंतें आदि सभी आपस के सहयोग से अपना-अपना कार्य करते हैं, उसी प्रकार से चार वर्ण प्राचीन काल में एक दूसरे से सहयोग करते हुए सुखपूर्वक जीवन निर्वाह करते थे। विद्या प्राप्ति के बाद पैतृक वर्ण परिवर्तन होना युक्ति व तर्क संगत होने के कारण होता था। शूद्र का पुत्र व पुत्री ब्राह्मण व अन्य वर्ण का बन सकता था व बन जाता था तथा अन्य-अन्य वर्णों के बालक व बालिकायें अन्य-अन्य वर्णों को अपने अपने गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार ग्रहण व धारण करते थे। यही वैदिक वर्ण व्यवस्था का यथार्थ स्वरूप था। इसी वर्णव्यवस्था ने महाभारतकाल के बाद मुख्यतः मध्यकाल में, अज्ञानता, स्वार्थ व उस समय की परिस्थितियों के कारण जन्मना जाति व्यवस्था का रूप ले लिया। इस जन्मना व्यवस्था ने कालान्तर में देश, काल व परिस्थितियों के कारण अनेक विकार जैसे छोटे-बड़े का भेदभाव, छुआ-छूत, अन्याय व शोषण का रूप ले लिया जो आज भी विद्यमान है। विवाह आदि भी जन्मना जातियों तक सीमित कर दिए जिससे वर-वधु के गुण व कर्म व स्वभावों की भिन्नता के कारण गृहस्थ का सुख समाप्त होकर सन्तानें भी गुणहीन, रोगी, ब्रह्मचर्य विहीन व अल्पायु होने लगी। यही मुख्यतः मुगलों एवं अंग्रेजों की गुलामी के कारण थे जिन्हें आज के हम लोग भी भोग रहे हैं। ज्ञान हो जाने पर भी हमारा इन अंघविश्वासों से पीछा नहीं छूट रहा है, यह दुःखद आश्चर्य है।
स्वामी दयानन्द जी ने संस्कार विधि में ब्राह्मण एवं इतर वर्णों के स्वरूप व लक्षण लिखे हैं। हम यहां उनके द्वारा ब्राह्मण विषयक स्वरूप व लक्षणों का उल्लेख कर रहे हैं। स्वामी जी ने मनुस्मृति व गीता के निम्न दो श्लोकों को उद्धृत किया है। मनुस्मृति का श्लोक है “अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहंचैव ब्राह्मणानामकल्पयत्।।” तथा गीता का श्लोक है “शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।” इनका अर्थः 1- निष्कपट होकर प्रीति से पुरुष पुरुषों को और स्त्री स्त्रियों को पढ़ावें। 2- पूर्ण विद्या पढ़े। 3- अग्निहोत्रादि यज्ञ करें। 4- यज्ञ करावें। 5- विद्या अथवा सुवर्ण आदि का सुपात्रों को दान देवें। 6- न्याय से धनोपार्जन करने वाले गृहस्थों से दान लेवें भी। इन में से तीन कर्म पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना धर्म में और तीन कर्म पढ़ाना, यज्ञ कराना, दान लेना जीविका है। परन्तु– ‘प्रतिग्रहः प्रत्यवरः’।। मनुस्मति। अर्थात् जो दान लेना है, वह नीच कर्म है। किन्तु पढ़ा के और यज्ञ कराके जीविका करनी उत्तम है।।1।। (शमः) मन को अधर्म में न जाने दे किन्तु अधर्म करने की इच्छा भी न उठने देवें, (दमः) श्रोत्रादि इन्द्रियों को अधर्माचरण से सदा दूर रक्खे, दूर रख के धर्म ही के बीच में प्रवृत्त रक्खें, (तपः) ब्रह्मचर्य, विद्या, योगाभ्यास की सिद्धि के लिये शीत, उष्ण, निन्दा, स्तुति, क्षुधा, तृषा, मानापमान आदि द्वन्द्वों का सहना, (शौचम्) राग द्वेष मोहादि से मन और आत्मा को तथा जलादि से शरीर को सदा पवित्र रखना, (शान्तिः) क्षमा अर्थात् कोई निन्दा स्तुति आदि से सतावें तो भी उन पर कृपालु रह कर क्रोधादि का न करना, (आर्जवम्) निरभिमान रहना, दम्भ स्वात्मश्लाघा अर्थात् अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करके नम्र सरल शुद्ध पवित्र भाव रखना, (ज्ञानम्) सब शास्त्रों को पढ़ के विचार कर उनके शब्दार्थ सम्बन्धों को यथावत् जानकर पढ़ाने का पूर्ण सामथ्र्य प्राप्त करना, (विज्ञानम्) पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों को जान और क्रियाकुशलता तथा योगाभ्यास से साक्षात् करके यथावत् उपकार ग्रहण करना कराना, (आस्तिक्यम्) परमेश्वर, वेद, धर्म, परलोक, परजन्म, पूर्वजन्म, कर्मफल और मुक्ति से विमुख कभी न होना। ये नव कर्म और गुण धर्म में समझना। सब से उत्तम गुण कर्म स्वभाव को धारण करना। ये गुण कर्म जिस व्यक्ति में हों वे ब्राह्मण और ब्राह्मणी होवें। विवाह भी इन्हीं वर्ण के गुण कर्म स्वभावों को मिला कर ही करें। मनुष्यमात्र में से इन्हीं को ब्राह्मण वर्ण का अधिकार होवे।।2।।
ऋषि दयानन्द ने शास्त्र प्रमाण से ब्राह्मण के स्वरूप व लक्षणों पर जो प्रकाश डाला है उसके अनुरुप समाज में मनुष्य मिलने असम्भव हैं परन्तु कुछ अपवाद हो सकते हैं। आज गुण-कर्म-स्वभावानुसार वैदिक वर्ण-व्यवस्था पूर्णतः समाप्त है। वर्तमान की जन्मना व्यवस्था में उत्तम गुण-कर्म-स्वभावों के कहीं दर्शन नहीं होते। सभी भौतिक सुखों व अपनी सुख-समृद्धि को ही जीवन का लक्ष्य माने बैठे हैं। जब विपदा आती है तो कुछ देर के लिए अक्ल आती है। श्रेष्ठ मनुष्य का निर्माण न होने का कारण भी यही है कि हमने वेदों का अध्ययन, अध्यापन, स्वाध्याय व वर्ण-व्यवस्था का त्याग कर दिया है। विस्तार भय से हम अन्य वर्णों के स्वरुप व लक्षणें का ऋषि वर्णित विवरण नहीं दे पा रहें हैं। पाठक कृपया इसके लिए संस्कारविधि का अनुशीलन करें। हम आशा करते हैं कि इस लेख से वर्णव्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है। इसी के साथ लेखनी को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।
–मनमोहन कुमार आर्य
