गीत/नवगीत

कुछ कहना चाहूँगा

इक बात सुनो लोगों ‘
कुछ कहना चाहूँगा
मरने से पहले मैं ‘
ना मरना चाहूँगा ।।

खाने के लिए जीना ना ‘
जीने के लिए खा लो
जो शूल बिछाएं पथ में ‘
उन पर सुमन डालो

चोरी चुगली जामिन से ‘
खुद को तुम दुर रखो
सच के रस्ते चलकर
मंजील का स्वाद चखो
कर रार कभी ना बड़न से
यह कहना चाहूँगा
मरने से पहले मैं
ना मरना चाहूँगा ।।

हर रोम ऋणी है वतन का
मैं ये इकरार करूँ
गर जान पड़े भी देनी
मैं ना इंकार करूँ
सीमा पे सिपाही देते हैं
अपने जां की कुरबानी
थे धन्य जवान वो अपने
और धन्य थी उनकी जवानी
उनकी ही तरह कुछ मैं
भी करना चाहूँगा
मरने से पहले मैं
ना मरना चाहूँगा ।।

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।