गीत/नवगीत

जन गण की आशाएं भी है

जन गण की आशाएं भी है
जन मन की पीड़ाएं भी है
दोनों की अपनी परिभाषा
दोनों की अपनी मजबूरी

हर कोई जन मन के रथ को
मन मर्जी से हाँक रहा है
चढे मुखौटों के भीतर से
जन गण सबको झाँक रहा है
जाने कितनी और बढेगी
जन की गण की है जो दूरी…
दोनों की अपनी परिभाषा
दोनों की अपनी मजबूरी…

कल्पित चेहरे कल्पित बातें
बदली बदली परिभाषाएँ
भ्रमित भ्रमित से पथपर्दर्शक
ओझल ओझल हुई दिशाएँ
सत्तासुख की उडी धूल ने
ढकी रोशनी पूरी पूरी…
दोनों की अपनी परिभाषा
दोनों की अपनी मजबूरी…

दोष लगाया है दीपक पर
तेज हवा ने अंधियारों का
कैसे उत्तर देगा बोलो
जन मन दोनों के नारों का
जीवन बिना हवा नामुमकिन
दीप बिना दुनियाँ बे नूरी…
दोनों की अपनी परिभाषा
दोनों की अपनी मजबूरी…

राजनीति के गलियारों की
अभिलाषाएं मचल रही हैं
जन से गण के रिश्तों की नित
परिभाषाएँ बदल रही हैं
सत्ता से जन की सत्ता की
आस सदा ही रही अधूरी…
दोनों की अपनी परिभाषा
दोनों की अपनी मजबूरी…

सतीश बंसल
१६.०३.२०१७

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.