गीतिका/ग़ज़ल

बसाया हो जिन्होंने खुल के अपनी बस्तियों में,,,,,

बरगद की तरह अगाध प्रेम है उन पक्षियों में
बसाया है जिन्होंने खुल के अपनी बस्तियों में

स्वछन्द विचरण करने की जब भी हुई इक्षा
समीर को सहलाया इसने हार सी पत्तियों में

मोहताज नही है ये इंशा किसी शक्स का तब
जब खुद को उजाड़ के मिलाया हो हस्तियों में

डूबते को जब भी जरूरत जान पड़ी इसकी तो
काट शाख को पतवार बना लगाई किस्तियो में

बरगद की तरह अगाध प्रेम है उन पक्षियों में
बसाया हो जिन्होंने खुल के अपनी बस्तियों में

उषसी को थकाया हो जिसने बड़े ही अदब से
सांझ बनके सुलाया है मैने तब उसे सर्दियों में

व्यार्त हर जीव की पीड़ा नैनों से छलकाई हो
पीड़ा मिली हो मूक जान उसे टनों मस्तियों में

ये ह्रदय पटल स्वागत को आतुर उसके खातिर
आँचल भीगा जिसका अनाथ की सिसकियों में

कलेजे का टुकड़ा टुकड़ा पगतल बिछा दूँ यारो
कलेजे से लगाया हो जिस किसी शै ने क्षुब्दियों में

बरगद की तरह अगाध प्रेम है उन पक्षियों में
बसाया हो जिसने खुल के अपनी बस्तियों में

संदीप चतुर्वेदी ” संघर्ष ”
23/02/2018
प्रातः 8 बजे

संदीप चतुर्वेदी "संघर्ष"

s/o श्री हरकिशोर चतुर्वेदी निवास -- मूसानगर अतर्रा - बांदा ( उत्तर प्रदेश ) कार्य -- एक प्राइवेट स्कूल संचालक ( s s कान्वेंट स्कूल ) विशेष -- आकाशवाणी छतरपुर में काव्य पाठ मो. 75665 01631