सामाजिक

लेख– सरकारी अस्पतालों की बदहाली दूर करने की पहल कब होगा!

हम और हमारी व्यवस्था जिस दौर में विकास दर में बढ़ोतरी पर इठला रही है। उस दौर में अगर ब्रिटेन की स्वास्थ्य जगत से जुड़ीं लांसेट पत्रिका यह कहती है, कि भारत स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में भूटान और बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों से भी पीछे है। तो यह शर्मनाक स्थिति पैदा करता है। साथ में तमाचा भी है, उस नीति-नियंता के मुंह पर जिसे जाति-धर्म और अपने राजनीतिक हित से परे देखने का समय ही नही है। साथ में लांसेट की रिपोर्ट ने उस धारणा की बखिया भी उदेड़ने का काम किया है। जिसके मुताबिक अभी तक यह माना जाता रहा, कि विकास दर में वृद्धि ही सबकुछ होती है। अगर वर्तमान दौर में यह स्वयंसिद्ध हो गया है, कि जीडीपी में वृद्धि को ही विकास का पैमाना नहीं कहा जा सकता। तो अब आवश्यकता इस बात की है, कि जन-स्वास्थ्य,सामाजिक शांति, स्वास्थ्य, सौहार्द तथा प्रसन्नता जैसे मानकों को विकास की कसौटी बनाने की दिशा में रहनुमाई व्यवस्था क़दम बढ़ाएं।

वैसे किसी भी मुल्क के विकास की आधारशिला वहां के नौनिहालों को बेहतर तालीम, युवाओं को बेहतर रोजगार के अवसर औऱ जरूरतमंद के लिए दवा आदि उपलब्ध कराने पर आश्रित होती है। ऐसे में अगर किसी राष्ट्र के बहुसंख्यक अवाम को बेहतर स्वस्थ और शिक्षा नसीब नहीं होगी। तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मंत्रियों के पुश- अप मारने मात्र से न देश की मलिन स्वास्थ्य व्यवस्था में परिवर्तन आएगा, और न ही जीडीपी बढ़ने पर रहनुमाई व्यवस्था का अपने आप की पीठ ठोकने से देश की सामाजिक विपन्नता दूर हो पाएंगी। आज अगर देश में हर तरफ लचर शिक्षा व्यवस्था और बदहाल स्वास्थ सेवाओं का बोलबाला है। युवा पढ़-लिखकर भी रोजगार प्राप्त करने योग्य नहीं बन पा रहा। फ़िर स्थिति सच में नाज़ुक हालात से गुज़र रही है। इसके अलावा देश के मासूम तक अगर स्कूलों में सुरक्षित नहीं हैं। ऐसे में स्कूल चले हम का नारा सरकारी विज्ञापन से ज़्यादा कुछ समझ आता नहीं। जिसको सिर्फ़ वाहवाही के लिए रहनुमाई तंत्र ढोने को मजबूर दिख रहा है। युवाओं पर राजनीति गुमान कर रहीं है। पर अंधकार की तरफ़ जाते युवा पीढ़ी के लिए चिराग़ बनने में शायद लोकतांत्रिक व्यवस्था के हाथ-पैर फूल रहें हैं। जो चिंताजनक स्थिति पैदा कर रहें हैं। वैसे देखा जाएं, तो सामाजिक समरसता भी पिछले कुछ समय से देश के भीतर कमज़ोर पड़ रही है। जातीय हिंसा समाज में बढ़ रही है। ऐसे में हम सिर्फ़ जीडीपी में बढ़ोतरी पर इतरा कर न सबका विकास कर सकते हैं, और न एक बेहतर सामाजिक परिदृश्य की झलक प्रस्तुत कर सकते हैं। वैसे देश के हालात कई मायनों में पतले हो चुके हैं। पर जिस दौर में जीडीपी में बढ़ोतरी का सरकारी झुनझुना पीटकर अन्य सामाजिक और सामुदायिक मुद्दें को रोशनदान पर रहनुमाई व्यवस्था रखने की फ़िराक़ में है। उसमें से आज ज़िक्र देश की मलिन होती सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था की करतें है।

अगर देखा जाए, तो अपने नागरिकों के जीवन की रक्षा करना किसी भी सरकार का सबसे बड़ा दायित्व होता है, लेकिन अगर हालत यह है कि अपनी अर्थव्यवस्था पर इतराने वाला देश ही स्वास्थ्य मद पर जीडीपी का सबसे कम ख़र्च करता है। तो यह चिंताजनक स्थिति है। हमारे देश में प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल बदहाली के पर्याय तो पहले ही बन चुके हैं। तो इसके अलावा भी देश के भीतर सेहत को संकट में डालने वाले कारक मौजूद हैं। जिसमें प्रशिक्षित डॉक्टरों की कमी, पर्याप्त संसाधन सरकारी अस्पतालों में न होना, प्रदूषण की गिरफ्त में फंसती जीवन शैली। इसके अलावा मिलावट का बढ़ता कारोबार भी समाज को बीमार बनाने पर तुला हुआ है। वैसे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की क्या स्थिति है। उसके लिए किसी रिपोर्ट की आवश्यकता नहीं। फ़िर भी कुछ रिपोर्ट्स और उदाहरण से कहानी को समझने की कोशिश की जाए, जिससे हो सकता है, लुटियंस की दिल्ली को भी कुछ भनक लगे।
एक आँकड़े के मुताबिक देश में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर यह है कि देश में 27 फीसदी मौतें सिर्फ इसलिए हो जाती है, क्योंकि लोगों को वक्त पर स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर नहीं होती। देश में जीडीपी का सिर्फ 1.4 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च होता है। वहीं अमेरिका जीडीपी का 8.3 फीसदी स्वास्थ्य पर तो चीन 3.1 फीसदी खर्च करता है। दक्षिण अफ्रीका 4.2 फीसदी तो ब्राजील 3.8 फीसदी का खर्च अपनी जीडीपी का स्वास्थ्य पर करता है। इसके अलावा झारखंड में सबसे बड़े अस्पताल में फ़र्श पर मरीज़ को परोसे गए खाने की तस्वीर शायद किसी को याद दिलाने की ज़रूरत पड़े। लेकिन हद तो तब हो गईं, जब बुलढाणा जिले में मरीजों को एक्सपेरी डेट की दवा तक थमा दी गई। तो ऐसे में अगर पिछले साल सीएजी की रिपार्ट में जिक्र हुआ था , कि 24 राज्यों के पास ज़ुकाम, पेट दर्द और बुख़ार की दवाएं तक उपलब्ध नही। फ़िर स्वास्थ्य सुविधाओं की क्या दशा देश में है। उससे कोई भी मुँह नहीं छिपा सकता। जिसमें सुधार होना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ जीवन मयस्सर होना लोगों का लोकतंत्र में अधिकार है।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896