गीत/नवगीत

हे माँ गंगे

हे देवसरी, हे देवनदी।
हे देवपगा, हे ध्रुवनन्दा।
करती पितरों का तुम तारन।
कहलाती हो तुम माँ गंगा।।

गंगोत्री हिमनद से निकली।
हिमगिरि के चरणों से फिसली।
करती कल-कल, छल-छल निकली।
उन्मत्त यूँ लहराकर निकली।
करती जगती का तुम तारन।
कहलाती हो तुम हिमगंगा।
करती पितरों का तुमतारन।
कहलाती हो तुम माँ गंगा।

स्नान मात्र से हे माता।
पापों को तुम हरती माता।
जगती पाती परिधान हरे।
कर विटप, पुष्प को तुम सिंचित।
तेरा जल न पाने पर माँ।
हो जाये धरती भी बन्ध्या।
करती पितरों का तुम तारन।
कहलाती हो तुम माँ गंगा।

क्या ऋषिकेश, क्या हरिद्वार?
क्या तिरवेणी, क्या है काशी?
सब तीर्थों को पावन करती।
माता तुम हो सुख की राशि।
जन-जन तेरा पूजन करता।
लंगड़ा हो या वह हो अंधा।
करती पितरों का तुम तारन।
कहलाती हो तुम माँ गंगा।

पाकर के धवल धार तेरी।
हर्षित हो जाते नर-नारी।
अंतिम जल तेरा पीकर माँ।
मरने वाले को स्वर्ग मिले।
तेरा ही नीर पान करके।
जगती पर सुंदर सुमन खिले।
पर ये कैसी मानवता है।
कर रही मात निज जल गन्दा।
करती पितरों का तुम तारन।
कहलाती हो तुम माँ गंगा।

लाल चन्द्र यादव

लाल चन्द्र यादव

ग्राम शाहपुर, पोस्ट मठिया, जि. अम्बेडकर नगर उ.प्र. 224149 शिक्षा एम.ए. हिन्दी, बी.एड. व्यवसाय शिक्षक, बेसिक शिक्षा परिषद, जिला-बरेली