कहानी

शराबी पिता

फूफा जी नमस्ते , कैसे हो फूफा जी ?

‘मैं ठीक हूँ , ‘
आप कैसी हैं ?
‘मैं भी ठीक हूँ फूफाजी।’
मैने पहचाना नही आपको ?
सुडौल शरीर लम्बी कद की, हल्का साँवला रंग , नाक नक्शा से सुंदर छरहरा बदन , चढ़ती उम्र भी थी, इसलिए सुंदर भी दीखती थी।
‘अरे ये नीति है मेरे परिवार में से ही है इसका घर हमारे घर से थोड़ा अंदर को है।
‘ओके,’
‘आये दिन अक्सर ये मेरे घर आती जाती रहती है बेचारी बहुत अच्छी है लड़की है। लेकिन इसके परिवार वालों ने सब कुछ चौपट कर दिया,’
‘वो कैसे ?’
‘यह परिवार बहुत अच्छा था …घरवार और खेती भी अच्छी थी। लेकिन इसके पिता शराब पीने लगे और इसके दो भाई वो भी …..
अकेली माँ बिचारी क्या करती …. इन सबको काफी समझाती लेकिन कोई नही मानता, धीरे धीरे पिता को शराब और सट्टे की लत लग गई और सट्टे और शराब के चक्कर में धीरे धीरे सारा खेत भी बिक गया, वही आदत बच्चों में भी आ गई , वो भी घर से पैसे निकाल कर ले जाते और शराब पीने लगे, सट्टा खेलने लगे। माँ के सारे गहने पिता ने पहले ही बेच दिए, कुछ सामान घर में मिलता तो उसे ये ले जाकर बेच आते, जब कही से पैसा नही मिलता तो चोरी करने लगे …. हालत ये हो गई कि गांव में कोई इनको अपने पास नही बिठाता। आये दिन शराब पीना इनकी आदत बन गई , माँ को पीटते कभी इसपर भी हाथ उठा देते, माँ समझाने की कोशिश करती तो गाली-गलौज पर उतारू हो जाते।
माँ के साथ इसको भी सब कुछ सुनना पड़ता, ये भी बिचारी क्या करे, कभी अपनी माँ के साथ तंग होकर ननिहाल चली जाती जैसे तैसे बारहवीं क्लास पास कर ली , फिर इसके मामा ने बी.ए. का प्राइवेट फार्म भी भरवा दिया अब ये बी.ए. सेकेंडियर कर रही है।
जब भी मैं यहां आती हूँ तो ये मेरे पास आ जाती है , कुछ मदद भी कर देती हूँ। बहुत सीधी है …
अपनी बात आखिर कहे तो किससे कहे, अपने घर का दुख मुझे आकर बता देती है इसकी बातों को सुन कर मुझे भी कभी कभी रोना आता है , पर क्या करें किस्मत है इसकी।
इसका जीवन भी जीते जी नरक बना दिया इसके घरवालों ने, भला इसमें इसका भी क्या दोष है।
खुद तो हैं ही इसको भी परेशान करते हैं, इसकी माँ भी रो… रो कर अपना जीवन काटती है आखिर करे तो क्या करे। बड़ी मजबूर हैं । कहती है कि “बेटा मेरी जो दशा की है इन्होंने वो तो है ही मुझे कही को नही छोड़ो, इसके बाप ने मेरी दुर्गति तो करि ही दई , लड़का भी दोनों इसके रास्ते पे चले गए, लेकिन मेरो तो जीवन नरक बनाए दियो, पर या बिटिया ए भी जि बेचि के खाई जाएंगे, याके पीरे हाथ होनो मुश्किल है बेटा, जाए उ नरक में धकेल जांगे, मोपेउ कछु नाय छोड़ो जो में जाय दे जाती, पर मैं सोचि रही हु केसेउ मेरे सामने जाके पीरे हाथ है जायँ, परि कहा करू …..” इसकी माँ अक्सर इसको लेकर परेशां रहती…।
ये नीति बड़ी खुश मिजाज है पता है,
एक दिन नीति मुझसे कह रही थी कि ‘बुआ जी मैंने फूफा जी को नही देखा है जब भी आयें तो मुझे बताना।’
मैंने कहा, ‘तेरे मन में फूफा जी को लेकर कुछ चल तो नही रहा है बता दे, नही बुआ जी आप भी न, कैसी बात सोचती हो , मैं क्या ऐसी दिखती हूँ आपको!’
‘नही मैं तो मजाक कर रही थी तुझसे….पगली।’
‘आज आप आये हैं तो इसलिए आयी है ये। कह रही थी कि ,
‘बुआ जी फूफा जी बहुत अच्छे हैं।’
धीरे धीरे समय बीतता गया अपनी बुआ जी से बात करती रहती और फिर मेरे बारे में भी….और फिर फोन पर मुझसे बात करती रहती अपनी परेशानी और अपने घर पिता की और भाईयो की बात करती मैं भी उसे समझाते हुए कहता कि, ‘देखो नीति आप अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो कोई बात नही अगर आपको घर वाले तंग करते हैं तो आप आगरा में अपनी माँ को लेकर आ आजाओ कुछ काम मिल जाएगा और आपकी पढ़ाई भी हो जाएगी और अपनी पढ़ाई को जारी रखते हुए आगे की तैयारी भी करते रहिए….’
‘जी फूफाजी।’
‘मेरे लायक कोई मदद हो तो बताना, मैं भी आपके लिए कोई नौकरी की तलाश करता हूँ, ओके।’
‘मेरे मामा भी आगरा में ही रहते हैं फूफा जी।’
‘तो वही आकर रहो, कुछ दिन उनके पास रहो, फिर कहीं किराए पर आप और माँ दोनों रह लेना ठीक है,’ कहकर फिर मैंने फोन काट दिया।
उसने ऐसा ही किया नीति अपनी माँ को साथ लेकर अपने मामा के यहाँ आगरा आगई। कुछ दिन रहने के बाद मंगलायतन विश्वविद्यालय मथुरा में वार्डन का जॉब करने लगी। नीति का फोन आया कि,
‘फूफा जी मैने नौकरी लगा ली है , और माँ को भी मैं साथ ले आई हूं।’
मैने कहा, ‘अच्छी बात है, और अपनी पढ़ाई भी करते रहना ठीक है,
‘जी फूफा जी नमस्ते।’
एक दिन उसकी माँ की तबियत अचानक से बिगड़ गई और उसको आगरा सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया, पत्नी सोनम ने बताया कि, ‘नीति की माँ की तबियत बहुत बिगड़ गई है और वो आगरा में ही हॉस्पिटल में एडमिट है, पता चलते ही सोनम को लेकर साम को हॉस्पिटल पहुंचे देखा कि ऑक्सीजन लगी हुई थी सीरियस स्थिति थी नीति रोये जा रही थी बुआ जी अब मेरी माँ नही बचेगी …..वहां उड़के दोनों भाई और पिता भी आ गये थे…’
उसको समझाते हुए कहा कि, ‘चिन्ता मत करो माँ जल्द ही ठीक हो जाएगी ऐसे रोते नही हैं….’
तभी देखा कि अचानक से पेट फूल गया डॉक्टर को बुलाया उसने मल के रास्ते से गैस निकाल दी और दवा का इंजेक्शन ड्रिप में डाल कर चला गया, पांच मिनट बाद नीति ने इशारे से माँ को बताया कि,
‘माँ देखो ! ‘बुआजी और फूफा जी आये हैं, आपको देखने…’
उसकी माँ ने देखा …..और अपनी बेटी की ओर इशारे से संकेत किया, हमने भी सांत्वना दी कि आप जल्द ही ठीक हो जाओगी, लेकिन लगभग 5 मिनट ही उसकी माँ की आखों से किनारे से आंसू बहने लगे … और वह हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई।
नीति के ऊपर जो माँ का साया था वो हमेशा हमेशा के लिए उठ गया अब वो बेचारी किसके सहारे जिये उसे उसके मामा अपने साथ ले गए वहीं रहने लगी… लेकिन आज के समय में कौन किसके लिए करता है सबको अपने बच्चों की ही लालसा रहती है । कोई किसी का नही होता फिर चाहे वह कितना भी खास रिस्तेदार ही क्यों न हो। ऊपर वाला भी क्या क्या वक्त दिखाता है, वो हरपल माँ की याद में ही खोई रहती …. न खाना खाती, न ही सोती …. वह जीवन से नफरत करने लगी … भला कर भी तो कुछ नही सकती।
खुद को कोसती रहती कि…. ऐसी माँ ने मुझे जन्म ही क्यों दिया मुझे मार देती तो ही अच्छा था।
जीवन में उसके बड़े अरमान थे कुछ कर गुजरने की तम्मना थी , लेकिन सब अरमान धरे के धरे रह गए,
क्या करे ….ऐसे जीवन से तो मर जाना ही अच्छा है। ईश्वर के आगे किसी की नही चलती।
मामा और मामी और उनके परिवार के लोग भी इतना ध्यान नही देते …धीरे धीरे उसकी भी तबियत बिगड़ने लगी डॉक्टर ने टी. वी. आदि की बीमारी बता दी…..इलाज जैसा भी हुआ उसके मामा ने ही करवाया ….और वो भी माँ के जाने के तीन माह बाद एक दिन इस दुनिया को अलविदा कर अपनी माँ के पास ही चली गई।
उसके दो माह पश्चात ही उसका पिता भी चला गया। उसके दोनों भाई चोरी, डकैती, मर्डर आदि केसों में जेल की हवा काट रहे हैं। अगर सजा काटकर आ भी जाते हैं तो फिर किसी कांड में पकड़े जाते हैं। बड़े बड़े नेता अपना क्रिमिनल कांड करवाने के लिए ऐसे बदमाशों को पाल कर रखते हैं। एक दिन मैं उसके गांव से सोनम को लेकर गाड़ी स्टार्ट कर घर से जैसे ही निकलने को हुआ, न ज्यादा सर्दी थी न गर्मी ठीक मौसम था, दिन के लगभग बारह बज रहे थे तभी आचानक तीन पुलिस की गाड़ी आई। उसमें से निकलकर उसके बड़े भाई को सोते हुए सिविल ड्रेस में पुलिस वालों ने अचानक से पकड़ लिया। पता चला कि किसी बड़े जुर्म में दबिश देकर उसको पकड़ा है, वैसे भी वारंट भी इसके नाम निकले हुए है। कारण केवल शराब की बुरी लत की वजह से सब कुछ होते हुए भी सबकुछ खत्म होगया। एक छोटा परिवार था गांव में मकान, खेती भी और हंसता खेलता जीवन कुछ ही समय में सब कुछ सिमट गया।

डॉ. दिग्विजय कुमार शर्मा

शिक्षाविद, साहित्यकार, आगरा M-8218254541