गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

रात ,आंखो से नींद जाती रही
टुकड़े हुए सपनों को जोड़ती रही

फ़लक पर खामोश था चांद
चांदनी जग रोशन करती रही

मदिर-मदिर समीर बहती रही
रात-रानी खुशबू बिखेरती रही

कहीं विरहिणी सिसकती रही
कहीं दो जिस्म एक होती रही

करवटें बदलते रात गुजरती रही
सूर्य-किरणे आकर पास रूकी रहीं

सपने जोड़ने में पागल बनी रही
हकीक़त से मैं क्यों दूर भागती रही।

सपने कभी अपने होते नहीं
मृगतृष्णा में मैं यूं ही भागती रही

— मंजु लता

डॉ. मंजु लता Noida

मैं इलाहाबाद में रहती हूं।मेरी शिक्षा पटना विश्वविद्यालय से तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई है। इतिहास, समाजशास्त्र,एवं शिक्षा शास्त्र में परास्नातक और शिक्षा शास्त्र में डाक्ट्रेट भी किया है।कुछ वर्षों तक डिग्री कालेजों में अध्यापन भी किया। साहित्य में रूचि हमेशा से रही है। प्रारम्भिक वर्षों में काशवाणी,पटना से कहानी बोला करती थी ।छिट फुट, यदा कदा मैगज़ीन में कहानी प्रकाशित होती रही। काफी समय गुजर गया।बीच में लेखन कार्य अवरूद्ध रहा।इन दिनों मैं विभिन्न सामाजिक- साहित्यिक समूहों से जुड़ी हूं। मनरभ एन.जी.ओ. इलाहाबाद की अध्यक्षा हूं। मालवीय रोड, जार्ज टाऊन प्रयागराज आजकल नोयडा में रहती हैं।