कविता

ये तो सोचो ज़रा

बहुत कहने से क्या ?
करोडो़ शास्त्रों से भी क्या ?
कर्मकाण्ड कराने में क्या?
तीर्थों पर भटकने से भी क्या?
चित्त की परम् शांति जब
ना मिली कहीं भी,
तो यूं हर चौखट पर दर बदर,
सर पटकने से होगा ही क्या??
जीत हार में उलझना ही क्या?
जब कर्म करने को गीता ने कहा,
तेरी मेरी करने में रखा ही क्या?
प्रेम ही हैं सार सब ग्रंथो का यहां,
खोने पर,रोने से, अवसादी होने से
होगा भी क्या?
और पाने की खुशी में बौखलाना भी क्या?
जब मिट्टी में मिलना ही हैं अंत तेरा,
हे,मानव ! जन्म में क्या और मरण में क्या?
जब सार्थक ना हुआ यहां कर्म तेरा,
काशी में क्या और काबे में क्या?
खोया जो तू और भटकता ही रहा
बेशुमार जगह जगह,
तो फिर तुझ में तेरा कुछ बचा ही क्या?
— दिव्या सक्सैना,कलम वाली दीदी

दिव्या सक्सेना

कलम वाली दीदी श्रीकृष्ण कालोनी,धान मील के पीछे,मस्जिद वाली गली,सिकंदर कम्पू लश्कर ग्वालियर-म0प्र0