कविता

आ जाओ मित्र

आ जाओ मित्र
अब गलबहियां डालने वाला कोई नहीं
पुरानी यादें बहुत सताती रुलाती है,
सब कुछ है हमारे पास,
पर जबरिया नाश्ता छीनकर खाने वाला कोई नहीं,
दिल की बातें सुनने वाला कोई नहीं,
अब उम्र नहीं,वय नहींमित्र नहींबालसखा नहीं,
कहां गए वह लोग जो गाली देकर बुलाया करते थे,
कहां गए वो लोग जो पीठ मे मुक्के मारा करते थे,
अब वह सुबह नहीं शाम नहीं,,
तुम घर से बाहर आकर नाम लेकर चिल्लाया करते,
और मैं दौड़े दौड़े तुमसे मिलने बाहर आ जाया करता था,
लपक कर सायकल के डण्डे मे बैठ अपने को राजा समझता,
वह झोपड़ीनुमा चाय की गुमटी,
एक अदद चाय की प्याली,
दोस्तों के साथ अमृत हुआ करती,
चाय से ज्यादा दोस्तों की अल्हड़ बातें उलाहने,टांग खिंचाई,ताने,सब कितनी
लुभावनी हुआ करती,
कोई समोसा खिला दे
तो बांछें खिल उठती थी,
एक शानदार पार्टी की तरह,
अब वह बड़ी होटलों के
खाने में मजा कहां,
लंबी लंबी ड्राइव में,
सायकल के डंडे में बैठने का रोमांच कहाँ,
लौट आओ दोस्त,
मुझे गालिया सुनाओ,
मुझे चिड़ाओ,
मेरी गुरूजी से,पिताजी से मेरी शिकायत करो,
नहीं आओगे,अकेला छोड़ दोगे,
पर वादा तो किया था ना
आने का।

— संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

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