कविता

हमारी बेटी

बजी खुशियों की शहनाई
जब वह दुनिया में आई |
जन्म उसका लड़की का
फिर भी अभिशाप कहलाई ||

उसे देख कर क्यों
सबकी आंखें हैं भर आई |
लड़का मांगा था उन्होंने
और वह बदनसीब ही बन पाई ||

पापा, बोले बेटा आता
छंद पैसे घर लाता |
परंतु लड़की है आई
अब इसकी करूं मैं भरपाई ||

उसके हर पहनावे पर
सब ने उंगली उठाई |
उसे आगे पढ़ने की
इजाज़त भी ना मिल पाई ||

ज़िद्दी वह बड़ी
इसीलिए हार ना मानी |
कुछ कर दिखाने की
उसने शपथ थी खाई ||

सब के विरुद्ध जाकर अपने
पैरों पर खड़ा हो दिखाया |
व हर बुरे हालात से
अपने परिवार को बचाया ||

अभिमान तब हुआ
जब पापा ने कहा |
बेटी ही सही मायने
में बेटा बन दिखाई ||

बेटी जीवन का आधार है
सुखों का संसार है |
सकारात्मक का किताब है
अच्छे कर्मों का भाग है ||

वह दुर्गा भी है काली भी
अज्ञान का विनाश है |
सबकी सेवा जो करती
वह ममता का भंडार है ||

वह हर ऊंचाइयों पर पहुंचती
जीतती हर किताब है |
बस निर्भया बनना ही
हर बेटी के इच्छा के खिलाफ है ||

रमिला राजपुरोहित

रमिला राजपुरोहित

रमीला कन्हैयालाल राजपुरोहित बी.ए. छात्रा उम्र-22 गोवा