कहानी

कहानी : सिर्रीगढ़ का राजसिंहासन

बहुत पुरानी बात है। सिर्रीगढ़ में कोलवंश के राजा शिखरचंद्र का राज्य था। महाराज शिखरचंद्र बड़े वीर , प्रतापी व प्रजा हितैषी राजा थे। महारानी सृष्टि के हृदय में भी प्रजा के प्रति अगाध स्नेह था। सिर्रीगढ़ की प्रजा अपने योग्यराजा से अत्यंत प्रसन्न व संतुष्ट थी। सुख-शांति और न्याय का निवास स्थल था वैभवपूर्ण सिर्रीगढ़।
महाराज शिखरचंद्र के दो पुत्र थे। शशांकचंद्र बड़ा था; और प्रदीपचंद्र छोटा। दोनों राजकुमार बहुत सुंदर एवं होनहार थे। राजा व रानी अपने पुत्रों से अति प्रसन्न थे। दोनों राजकुमारों का एक साथ खाना-पीना व खेलना-कूदना चलता था। उनकी किलकारियों से राजमहल भर जाता था। राजा और रानी अपने पुत्रों को देख फूला नहीं समाते थे। प्रजा भी दोनों राजकुमारों में अपने सिर्रीगढ़ का भविष्य निहारते हुए उनकी मंगल कामना करते थे।
समय बीतने लगा। सिर्रीगढ़ की किस्मत ने पलटा खाया। महाराज शिखरचंद्र बीमार पड़ गये। अपनी अस्वस्थता के चलते राजा जीवन के अंतिम पड़ाव पर जा पहुँचे। राजगुरु बुद्धिसागर , सारे वैद्य व प्रजा का प्रयत्न व्यर्थ रहा। महाराज शिखरचंद्र महारानी, दो अबोध राजकुमार एवं सर्वहितकारी प्रजा को छोड़कर चल बसे। सिर्रीगढ़ शोकसागर में डूब गया। अब राज्य की सत्ता की बागडोर महारानी सृष्टि के हाथों में आ गयी।
सिर्रीगढ़ को महारानी के केश श्वेत होते दिखाई देने लगे। अब राजमहल व राजपथ पर दो बालक नहीं, बल्कि दो युवा राजकुमारों के पग पड़ने लगे। बाल्यावस्था बहुत अच्छी बीती। दोनों राजकुमारों में युवावस्था ने परिवर्तन ला दिया। इनमें निजस्वार्थ व सत्ता लोभ पनपने लगे। दोनों में परस्पर ईर्ष्या का भाव छाने लगा। महारानी सृष्टि युवराज शशांकचंद्र को सिर्रीगढ़ के राजसिंहासन पर बिठाने का विचार करने लगी। मंत्रीगण व प्रजा भी इस विचार को समर्थन देने लगे क्योंकि शशांकचंद्र महाराज का ज्येष्ठ पुत्र शशांकचंद्र में एक योग्य व कुशल राजा के गुण थे।
एक दिन महारानी सृष्टि ने अपने दोनों पुत्रों को रनिवास में बुलाकर कहा – ” मेरे प्रिय पुत्रों ! अब राज्य का भार मुझसे नहीं सम्भाला जाएगा। इसलिए चाहती हूँ कि शशांक बेटा, तुम्हें मैं राजसिंहासन सौंप दूँ।” महारानी के शांत होते ही राजकुमार प्रदीपचंद्र ने ऊँचे स्वर में कहा – ” नहीं माता जी, ऐसा नहीं हो सकता। सिर्रीगढ़ का सिंहासन मुझे चाहिए।”
” नहीं…, सिर्रीगढ़ का राजा मैं बनूँगा, क्योंकि इस पर पहले मेरा अधिकार है।” राजकुमार शशांकचंद्र गरजते हुए बोला। अब महारानी के समक्ष एक गम्भीर समस्या खड़ी हो गयी। दोनों राजकुमारों को वह ताकती रह गयी। बोली – ” बेटे, तुम लोगों को क्या हो गया है। इस तरह की बातें क्यों कर रहे हो ? पुत्र प्रदीप, वैसे भी नियमतः इस सिंहासन का अधिकारी शशांकचंद्र ही है। वह इस राज्य का युवराज है। प्रदीप तुम भी मेरे पुत्र हो। मुझे गलत न समझना। तुम्हारा कोई अहित नहीं होगा।”
” माता जी, यह कदापि सम्भव नहीं है , मेरे होते शशांकचंद्र सिंहासन पर बैठे। कदापि नहीं। असम्भव। सिर्रीगढ़ का सिहासन मुझे चाहिए या फिर…” प्रदीपचंद्र आसन जमाते हुए बोला।
” फिर क्या…?” महारानी विस्मित हुई।
” कदाचित प्रदीपचंद्र सिर्रीगढ़ का विभाजन चाहता है। ” शशांकचंद्र बीच में बोल पड़ा।
” विभाजन ! मातृभूमि सिर्रीगढ़ का विभाजन ! तुम लोग ये क्या कह रहे हो ? मेरे पुत्रों , विभाजन के बारे में कैसे सोच लिया तुम लोगों ने। क्या हो गया है तुम्हें ? महारानी सृष्टि के स्वर में बड़ी तीव्र वेदना थी।
” हाँ माता जी, सिर्रीगढ़ का सिंहासन मुझे मिलना चाहिए या फिर सिर्रीगढ़ का विभाजन होना ही चाहिए।” दोनों राजकुमार  विषैली वाणी सुनाते हुए रनिवास से निकल पड़े।
महारानी सृष्टि को अपने पुत्रों के अभद्र व्यवहार से बहुत दुःख हुआ। उसे सिर्रीगढ़ की चिंता सताने लगी। अपने पुत्रों को निजस्वार्थ व राज्य लोलुपता की गर्त में गिरते देख रानी का तन काँटे की तरह सुखने लगा। मन में उथल-पुथल होने लगी; आशंकाओं से घिरने लगी। उनकी आँखों से निद्रा चली गयी। फिर रानी के मन में विचार आया कि सभा बुलाकर समस्या को सुलझाया जाय।
सिर्रीगढ़ की सभा लगी। महामंत्री शुभमसिंह , राजगुरू बुद्धिसागर ,दोनों राजकुमार एवं गणमान्य प्रजा उपस्थित थे। सभा में सन्नाटा छाया हुआ था। सभी चुप्पी साधकर महारानी को अपलक देख रहे थे। फिर श्वेत वस्त्र से घिरी राजसिंहासन पर बैठी महारानी सृष्टि कहने लगी – ” आदरणीय गुरुवर जी, महामंत्री शुभमसिंह जी ,मंत्रीगण, मेरे पुत्रों एवं मेरे प्रिय प्रजागण ! आप सबको विदित है कि मैं महाराज के स्वर्गवास के पश्चात सिर्रीगढ़ की सत्ता का संचालन करती रही। मैंने भी अपने पति महाराज के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए पूरी लगन व निष्ठा के साथ देश की सेवा की है ; परन्तु अब मैं चाहती हूँ कि सिर्रीगढ़ के सिंहासन पर मेरे ज्येष्ठ पुत्र युवराज शशांकचंद्र आसीन हो।” पूरी सभा रानी की वाणी को शांतिपूर्वक सुन रही थी। परन्तु युवराज शशांकचंद्र व प्रदीपचंद्र के माथे पर परेशानी की लकीरें थीं।
“परंतु मेरे दोनों बेटे सिर्रीगढ़ का विभाजन चाहते हैं, क्योंकि उन्हें स्वतंत्र राज्य चाहिए, पर मैं अपने जीते-जी राज्य का बटवारा नहीं होने दूँगी। महारानी राजगुरू बुद्धिसागर की ओर निहारती हुई बोली- “हे गुरूवर! मेरा यह निर्णय क्या उचित नहीं है? मैं असमंजस में हूँ कि क्या करूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।”
“महारानी! आपका निर्णय बिल्कुल उचित है। परम्परानुसार युवराज शशांकचंद्र ही राज्यसिंहासन का अधिकारी है। सिर्रीगढ़ के सुख, शांति व वैभव को देखते मेरी आँखें बुढ़ी हो गयी। राज्य की सेवा में मैंने अपने केश श्वेत कर डाले। मुझे इस धरती के कण-कण से बड़ा प्रेम है, अतः मैं भी विभाजन नहीं चाहता, क्योंकि विभाजन ही कोलवंश के विनाश और सिर्रीगढ़ के पतन का कारण बन सकता है। राजकुमारों को चाहिए कि वे अपने मन से निजस्वार्थ व फूटता की भावनाओं को त्याग दें, तभी देश का हित सम्भव है। उन्हें यह भी स्मरण रहे कि सर्वप्रथम वे सामान्य नागरिक की तरह केवल देश के संबंध में सोचें; मनन करें। राजा अथवा प्रजा का कर्तव्य सिर्फ देशहित के लिए होना चाहिए। अतः मेरा सुझाव है कि युवराज शशांकचंद्र को ही राजसिंहासन पर बिठाया जाय।” राजगुरु ने अपना आसन ग्रहण किया।
“गुरूवर! यह असम्भव है। मैं कभी ऐसा नहीं होने दूँगा। मुझे सिर्रीगढ़ राज्य मिलना ही चाहिए या फिर सिर्रीगढ़ का विभाजन होने दें।” राजकुमार प्रदीपचंद्र बीच में ही गरज पड़ा। माताजी, आपको अपना निर्णय बदलना ही होगा। क्या मैं आपका पुत्र नहीं हूँ? महाराज शिखरचंद्र मेरे पिता नहीं हथे?  माताजी, मुझे अपने अधिकार से वंचित करना था तो आपने मुझे जन्म ही क्यों दिया? जन्म देकर मुझे त्याग क्यों नहीं दिया?” महारानी सृष्टि पर किये राजकुमार प्रदीपचंद्र तेज शब्दों से सारी सभा स्तब्ध हो गयी। सभा साँय-साँय करने लगी। प्रदीपचंद्र के शब्दों पर किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हो पा रहा था। परंतु महारानी सृष्टि को पुत्र का कठोर वचन सहा नहीं गया। हृदय दहल गया। सजल आँखों से रानी बोली- “पुत्र प्रदीपचंद्र! तुम मुझे ऐसे भयानक शब्दों से क्यों घायल कर रहे हो? बेटा, मैं तुम्हारी माँ हूँ। संसार की हर माँ की तरह मैं भी तुम्हारा भला चाहती हूँ।” तभी “हे महारानी! कृपया शांत रहिए…शांत रहिए…सम्भालिए स्वयं को।” जैसे शब्द सभा से निकलने लगे। महामंत्री शुभमसिंह बोले- ” हे महारानी! अत्यंत दुःख की बात है कि आज सिर्रीगढ़ की धरती के दो टुकड़े होने की बात चल रही है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि स्वर्गीय महाराज शिखरचंद्र की धरती का विभाजन…!”
” महामंत्री जी! क्या इससे पहले कभी किसी राज्य का विभाजन नहीं हुआ है?” महामंत्री शुभमसिंह के कुछ और कहने के पूर्व ही शशांकचंद्र का तीखास्वर निकल पड़ा। हे माता जी ! आप तो अपने फैसले पर अडिग हैं; और हम दोनों भाइयों को एक-दूसरे की पराधीनता स्वीकार नहीं है। स्पष्ट है माते, कि कोलवंश के किसी एक दीपक को बुझना ही होगा।” आग उगलते हुए शशांकचंद्र बोला। शशांकचंद्र की तीव्र-गर्म वाणी से राजसभा झुलस सी गयी। महारानी सृष्टि अपने सिहासन से खड़ी होकर बोली- ” शशांकचंद्र! तुम क्या कह रहे हो?”
“माताजी! शशांकचंद्र ठीक ही कह रहा है। सिर्रीगढ़ की धरती का दो टुकड़ा होगा ही। मुझे शशांकचंद्र की चुनौती स्वीकार है। ‘ कहते हुए प्रदीपचंद्र अपनी म्यान से चमचमाती तलवार खींच ली। यह देख कर महारानी सृष्टि गरजती हुई बोली- “प्रदीपचंद्र! तुम क्या करने जा रहे हो?”.”माता जी! मुझे भी प्रदीपचंद्र की चुनौती स्वीकार है” , कहते हुए शशांकचंद्र ने तलवार लेकर प्रदीपचंद्र पर टूट पड़ा। दो चमचमाती तलवारें एक साथ टकराने लगीं। इन दोनों राजकुमारों को रोक पाना राजगुरु, महामंत्री, अन्य मंत्रीगण एवं उपस्थित गणमान्य प्रजा जन से सम्भव नहीं था। सबकी समझ व शक्ति जवाब देने लगी।
दोनों राजकुमार आज राज्यलोलुपता से पूरी तरह घिर चुके थे। उनकी आँखों में स्वार्थ हावी हो चुका था। उन्हें राजसिंहासन के सिवाय कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। दोनों को एक-दूसरे के खून के प्यासे हो चुके देख महारानी ने दौड़कर उनके हाथों की तलवारों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। वह अपनी आँखों के समक्ष कोलवंश के किसी भी दीपक को बुझने नहीं देना चाहती थी। गरजती हुई बोली- “ऐ मेरे पुत्रों! तुम्हें मातृभूमि सिर्रीगढ़ की धरती को दो टुकड़े करने से पहले अपनी माता अर्थात महारानी सृष्टि के हृदय को दो टुकड़े करना होगा। ऐ मेरे स्वार्थी-लोभी पुत्रों! महाराज शिखरचंद्र की रानी के होते तुम्हें इस धरती का तनिक हिस्सा भी नहीं मिलेगा। सिर्रीगढ़ महाराज शिखरचंद्र की धरोहर है। मेरे होते इस धरती को कोई आँख उठा कर नहीं देख सकता। मैंने भी सिर्रीगढ़ की रक्षा करने की कसम खाई है। यदि तुम्हें सिर्रीगढ़ की धरती या फिर राज्य का बटवारा चाहिए , तो पहले मेरे शरीर के दो टुकड़े कर लो; और रख लो एक-एक टुकड़े; और फिर कर लो सिर्रीगढ़ के दो हिस्से। कर दो अपनी जन्मभूमि का बटवारा।”  महारानी भंयकर रूप धारण कर चुकी थी। उनके दोनों मुट्ठियों में दो नंगी तलवारें धँसी हुई थीं। दोनों राजकुमार अपनी-अपनी तलवारें रानी की मुट्ठियों से अलग करने में असमर्थ होने लगे। फिर दोनों राजकुमारों की नजर अपनी विधवा माता महारानी सृष्टि की सजल नेत्रों एवं चूड़ियाँ रहित खून से सनी कलाइयों पर पड़ी। इस दृश्य ने दोनों राजकुमारों की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। फिर दोनों एक-दूसरे को एकटक देखने लगे। उन्हें अपना बचपन स्मरण होने लगा। एक-दूसरे की उँगलियाँ पकड़कर राजमहल में उनकी किलकारियाँ गूँजा करती थी। माता जी की गोद में दुबकना और दासियों के साथ बालक्रीड़ा करना रह-रहकर उनकी स्मृति पटल पर छाने लगी। बाल्यावस्था के पवित्र प्रेम व निःस्वार्थ स्नेह आँखों के समक्ष झूलने लगे। परंतु आज वे स्वार्थ व लोलुपता के चलते अपनी मातृभूमि की छाती को विभक्त करने उतारू हो गये थे। कुछेक क्षण पश्चात माता महारानी सृष्टि की दशा देख उनका विवेक जाग उठा। मन में विचार आता है कि हम अपनी माता को दुखी व मातृधरा को दो हिस्सों में बटते नहीं देख सकते। दोनों की मनोदशा जागृत हो उठती है। राजमाता सृष्टि की चीख सुन उनकी खामोशी टूटती है। ” हमें क्षमा करें माताजी , हमसे बहुत बड़ी भूल हुई है। अब हम ऐसा अपराध कभी नहीं करेंगे,” दोनों राजकुमार महारानी के पैर पर गिर पड़े। गिड़गिड़ाते हुए राजकुमार शशांकचंद्र बोला- “माता जी! मैं क्षमा योग्य भी नहीं हूँ। आप मुझे अपने इस अपराध के लिए जो सजा देना चाहेंगी, मुझे स्वीकार है। मैंने आपका दिल दुखाया है। मुझे अवश्य दंड दें।” फिर तभी राजकुमार प्रदीपचंद्र कहने लगा- “मेरा अपराध तो क्षमायोग्य भी नहीं है। मैंने स्वार्थ व राजलोलुपता के चलते अपनी जननी व जन्मभूमि को समझ नहीं पाया। मैंने तो आपके, भ्राता के अंतस व स्वर्गीय पिता महाराज की आत्मा को ठेस पहुँचाई है।” फिर अपने दोनों पुत्रों की आँखों से पश्चाताप के आँसू झरते देख उन्हें  गले से लगा लिया। राजमाता महारानी सृष्टि एवं दोनों राजकुमारों को एक-दूसरे लिपटे देख राजसभा गदगद हो गयी। तभी राजगुरु बुद्धिसागर के मुखारविंद से निकला- ” हे सिर्रीगढ़ की वसुंधरा! तू धन्य है! देर ही सही पर, तुम्हारे राजदीपों की ज्योति दमक उठी। तू धन्य है महारानी सृष्टि!  तुम्हारे कुमारों ने अपने अस्तित्व को पहचान तो लिया।”  महामंत्री शुभमसिंह की वाणी प्रवाहित होने लगी- “आज सिर्रीगढ़ की धरा पुनर्जीवित हो उठी है। सिर्रीगढ़ की जय! महारानी सृष्टि की जय! युवराज शशांकचंद्र की जय! राजकुमार प्रदीपचंद्र की जय!” जयघोष से सभा गूँज उठी।
 — टीकेश्वर सिन्हा”गब्दीवाला”

टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला"

शिक्षक , शासकीय माध्यमिक शाला -- सुरडोंगर. जिला- बालोद (छ.ग.)491230 मोबाईल -- 9753269282.