कविता

गूँगा प्यार

नहीं वह मेरा रहा – न मैं उसकी रही।
पर अलग होकर भी – हम हमारे रहे।।

मन की तूलिका से खींची,
उसकी धुँधली छवि देख,
आज भी आ रही हैं,
वे यादें,
टूटे गये शीशे के टुकड़ों समान,
टूटी-फ़ूटी यादें,
एक-ब-एक,
सिलसिलेवार।

फिर,
लहरों की फ़ितरत ग्रहण करके,
वापस चली जाती हैं,
गूँगे प्यार की,
वे यादें।
मन के समुन्दर में,
दबे पाँवों में,
चुपचाप।
आज भी बस,
मुझे यही कहनी है।

नहीं वह मेरा रहा, न मैं उसकी रही।
पर अलग होकर भी, हम हमारे रहे।।

— कलणि वि. पनागाॅड

कलणि वि. पनागॉड

B.A. in Hindi (SP) (USJP-Sri Lanka), PG Dip. in Hindi (KHS-Agra) श्री लंका में जन्मे सिंहली मातृभाषा भाषी एक आधुनिक कवयित्री है, जिसे अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा से भी बहुत लगाव है। श्री लंका के श्री जयवर्धनपुर विश्वविद्यालय से हिंदी विशेषवेदी उपाधि प्राप्त की उसने केंद्रीय हिंदी संस्थान-आगरा से हिंदी स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी पा ली है। वह श्री लंका में हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने की कोशिश करती रहती है।