कहानी

बिम्ब प्रतिबिम्ब (भाग 4)

प्रयोग की सफलता को लेकर हमारी शंका के बीच, उम्मीद की सिर्फ एक किरण थी कि जिन चूहों पर प्रयोग किया गया था, वे शीघ्र अपना संतुलन बनाना सीख लेते, भोजन की गंध पहचान लेते, टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरने में फिर से दक्षता प्राप्त कर लेते, और सबसे बड़ी बात ध्वनि पहचानने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. कारण स्पष्ट था, दिमाग में जो भी चित्र संग्रहित थे, वे उलट तो गये थे, पर दिमाग शीघ्र ही उलटी छवियों को अभ्यस्त हो जाता है. लेकिन सबसे विशेष बात यह है कि, गंध, स्वाद और ध्वनियाँ उलटती नहीं, अतः मस्तिष्क में इस प्रयोग के बाद भी स्वर, खुशबू या स्वाद की पहचान बरकरार रहनी थी.
शेखर ने निश्चय किया कि हम यह काम नितांत गोपनीय तरीके से करेंगे, बिना किसी को बताये और इस हेतु मुझे उसके सहायक से रूप में कुछ प्रणालियाँ सीखनीं पड़ीं, जिनके नोट्स भी तैयार थे. तो, सोमवार को हम अमेरिका पँहुचे थे और शनिवार सवेरे हम लोग दर्शन के संग प्रयोगशाला में वो करने जा रहे थे जिसके परिणाम को लेकर हममें दो लोग आशावादी थे, तो दो आशंकित…
दर्शन को शेखर ने एक समतल चौकोर पर खड़ा किया, जिसके बीच एक रेखा खिंची थी. दर्शन उसी रेखा के दोनों और पैर जमा कर सावधान खड़ा था. सात फुट उंचाई और तीन फुट व्यास का बेल जार, दर्शन को सिर से नीचे तक ढ़कने के लिये नीचे उतरने लगा.
शेखर ने आखिरी निर्देश दिये… “दर्शन, तुम्हारे सामने की लाल बत्ती जलने पर, तुम्हें बिना हिले डुले या साँस लिये लगभग बीस सेकंड रहना होगा. बेल जार के भीतर वैक्यूम बनाने में लगभग दस सैकंड लगेंगे, और अंतिम सैकंड में भीतर का तापमान गिरेगा, इतना अधिक, कि तुम सोच भी नहीं सकते. तापमान गिरते ही लगभग एक माइक्रो सैकंड में यह प्रक्रिया पूरी हो जायेगी और एक सैकंड में ही तापमान फिर से सामान्य हो जायेगा. फिर लगभग दस सैकंड और लगेंगे ताकि वायुदाब भी सामान्य स्तर पर ले आयें. तुमने जो स्पेस सूट पहना है, वह तुम्हें वायुदाब के परिवर्तन से बचायेगा. तुम तैयार हो?”
पृथ्वी पर हम पर हर समय वायुदाब रहता है. यूँ समझिये कि हम लगभग दस मीटर पानी के भीतर हर समय दबे रहते हैं. यदि यह दाब न हो तो हम कोई ध्वनि नहीं सुन सकेंगे और न साँस ले सकेंगे, साथ ही, हमारी नसें फट जायेंगीं और रक्त बाहर निकल आयेगा. . लेकिन इस प्रयोग में वायुदाब लगभग शून्य करने की आवश्यकता थी, जिसका एक नायाब तरीका शेखर के पास था. उसने दर्शन को अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा पहना जाने वाला स्पेस सूट पहनाकर बाहर के वायुदाब परिवर्तन से सुरक्षित कर लिया. स्पेससूट में तारों तथा नायलोन के कपड़े द्वारा कस कर शरीर को कृत्रिम दाब का आभास करवाया जाता है जो शरीर को सुरक्षित रखता है. मुझे डर यह था कि लगभग दो सैकंड के लिये जब दर्शन का तापमान गिरेगा तो क्या उसके शरीर पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा. वैसे, शेखर मुझे बता चुका था कि वह कई असाध्य रोगियों को क्रायो तकनीक से बेहद कम तापमान पर ले जा कर पुनः सामान्य तापमान पर लाने में सफल हुआ है. इतने कम समय में शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता.
तो लगभग शून्य दाब, शून्य तापमान पर जबकि परमाण्विक दोलन बेहद कम हो जायेगा, दर्शन के शरीर के हर परमाणु को शरीर के मध्य भाग से गुजरकर दूसरी और दोलन करना होगा. यह दोलन लगभग पाँच सौ मेगा हर्ट्ज की आवृत्ति पर होगा जिससे प्रत्येक दोलन में एक माइक्रोसैकंड का लगभग पाँच सौवाँ भाग ही लगेगा. लेकिन लगभग तीन सौ दोलन के बाद वह स्थिति आयेगी जब प्रयोग का अगला भाग आरंभ होगा. दोलन के अधिकतम विस्थापन की अवस्था में ही सभी परमाणुओं को रोक दिया जायेगा, जो उनकी मूल स्थिति का प्रतिबिंब होगा.
दर्शन ने सिर हिला कर सहमति दे दी. दर्शन को प्रयोग वाले स्थान पर खड़ा करने से पूर्व शेखर के निर्देशन में मैंने एक चूहे पर इस प्रक्रिया में सहायक के रूप में अनुभव हासिल कर लिया था. इस प्रकार हम सभी अपनी अपनी भूमिका निर्वाह करने हेतु तैयार हो चुके थे.
शेखर ने संकेत दिया, मैंने बेलजार की सील का निरीक्षण किया. वह निर्वात का दाब झेलने के लिये तैयार थी. द्रव हीलियम का टेंक पूरा भरा था. और उसका तापमान चार दशमलव पाँच डिग्री केल्विन था. परमाण्विक दोलन के लिये चुम्बकीय क्षेत्र जनक कॉइल पर दस हजार वोल्ट लगाया जा चुका था. तापमान गिरने के संग उसमें विद्युत धारा बहनी आरंभ होगी और बेल्जार के भीतर लगभग सात डिग्री केल्विन तापमान होने पर अतिचालकता के कारण विद्युत धारा इतनी अधिक हो जायेगी कि उसे मापा भी न जा सके. पर यह स्थिति मात्र एक माईक्रोसैकंड तक ही रहेगी. और इस अवधि में इतना चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होगा कि वह परमाण्विक दोलन को लगभग दो फुट तक विस्थापित कर सके. दर्शन जैसे हट्टे कट्टे व्यक्ति के लिये भी यह सीमा पर्याप्त थी.
शेखर ने निर्वात कम करने के लिये पंप आरंभ किया. पंप शुरु होने के संग ही सामने पैनल पर हलचल होने लगी. अगल बगल की पीली रोशनी का जलना बुझना बंद होते ही लाल बत्ती जल उठी. उसके नीचे स्थित टाईमर चल पड़ा. दर्शन अविचलित खड़ा था…दस, नौ… चार, तीन, दो, एक, शून्य…
मुझे लगा, वह शून्य वाला सैकंड बहुत देर तक रुका रहा… इस सेकंड में, बेल जार में प्लाज्मा की जोरदार चमक दिखाई दी, प्लाज्मा की चकाचौंध में दर्शन अदृश्य हो गया. अचानक प्लाज्मा का प्रकाश समाप्त हुआ, घड़ी पुनः चल पड़ी, और घड़ी के चलते ही दर्शन फिर से दिखने लगा. अगले दस सैकंड मुझे बहुत कठिन लगे… पर दस सैकंड बीतते ही शेखर ने बेल जार उठाने के लिये हाइड्रोलिक पंप चालू कर दिया…
“ताया जी…” दर्शन ने आवाज दी… मैं और हरमीत भागे… दर्शन वहीं खड़ा था, जहाँ हमने उसे छोड़ा था.
“तू ठीक तो है पुत्तर,” हरमीत ने भर्राये गले से पूछा…
हाँ, जी, वाहे गुरु दी मेहर…” लेकिन दर्शन का स्वर थोड़ा बदला बदला लग रहा था.
हमने दर्शन के सारे टेस्ट किये. उसके हृदय, मस्तिष्क तथा शेष अंगों में कोई असामान्यता गतिविधि नहीं पायी गयी. उसकी चाल भी ठीक थी. लोकोमोटर, दोनों हाथो का तालमेल, रिफ्लेक्स तथा संतुलन सभी सामान्य था. असामान्यता थी तो बस यही कि अब उसके स्कैन पिछले स्कैन के प्रतिबिंब लग रहे थे. और इसी प्रकार वह खुद भी अपना प्रतिबिंब ही बन चुका था.
हर प्रकार से तसल्ली करने के बाद, हम शाम को घर पँहुचे. शेखर के कुत्ते ने दर्शन को घूर कर देखा, जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो. इससे पहले कि वह कोई हरकत करता, मैंने शीशा जड़ा, अलमारी का पल्ला इस तरह घुमाया कि उस जीव को दर्शन के दर्शन शीशे में भी हो गये. कुत्ते को परिचय मिल गया, वह शांत होकर कमरे से बाहर निकल गया. और मुझे एक अच्छा तरीका सूझ गया…
नयी चुनौतियाँ … अगले भाग में
— रंजन माहेश्वरी

रंजन माहेश्वरी

प्रोफेसर, इलेक्ट्रॉनिक्स राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय कोटा (राज.) - 324010. निवासः 1002, Elanza, श्रीनाथपुरम, कोटा, 324 010. ब्लॉग nbt.in/manranjan