कविता

बे वजह ही पतिंगे सब मारे गए

शाम को यूँ लगा सामत आ गयी
देखते देखते बदली सी छा गयी

चमकी विजलियां गर्जना खूब हुई
सोंच शैलाब को लर्जना खूब हुई
न हम तैयार थे न था मौसम कोई
बेवक्त ही कोई बरखा आ गयी

तेज खूब पूर्वा हुई झूम शजरें गईं
इस अचम्भे की दूर तक खबरें गईं
जुगनुओं की चमक नज़र आने लगी
रिमझीम जब हुई सांझ सी छा गयी

छाई काली घटा छिप सितारे गए
बे वजह ही पतिंगे सब मारे गए
समझ के गए कि दिया जल रहा
जलती मसालें सामने आ गयी

भवंर से थे वाकिफ वो साहिल पे थे
जो बहे बहाव में वो जाहिल ही थे
दूरदर्शन का (राज) अभी भी सही
चाहते जो रहे वो सब पा गए

राजकुमार तिवारी (राज)
बाराबंकी उत्तर प्रदेश

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782