कविता

अपनों का साथ

समय की विडंबना देखिए
अपने भले अपने होते हों
पर अपनों का साथ नहीं है,
यूं भी कह सकते हैं हम
अपनों के साथ की जरूरत
जैसे महसूस ही नहीं हो रही।
क्योंकि अब अपने हों या अपनों का साथ
सब स्वार्थ की धुरी पर
उछलकूद कर रहे हैं,
अपनों से ज्यादा गैरों से
संबंध मधुर हो रहे हैं,
अपने तो गैरों से भी अधिक दूर हो रहे हैं।
अब तो अपने और अपनों का
जैसे अहसास मिट रहा है,
अपनों से दूरियां गैरों से नजदीकियों का

जैसे दौर चल रहा है,
आज भला कितने लोग हैं
जिन्हें अपने और अपनों के
साथ की जरूरत है,
जरुरत है भी तो
स्वार्थ पहली शर्त है।
आज अपने और अपनों को

भला कौन पूछता है,
पूछता भी है तो भला
अपनेपन का भाव कितना है?
अब तो अपने और अपनों को भी
औकात के तराजू पर तौला जाता है,
जिसकी जितनी औकात हो
उसी हिसाब से उसको अपना कहा जाता है,
उसी हिसाब से अपनों का साथ भी
लिया और दिया जाता है।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921