कविता

अशांति उन्मूलन

अशांति उन्मूलन की बात
करने से तो अच्छा है
हम शांति शांति का जाप करें,
अशांति होने ही न पाए
फिर उन्मूलन क्यों करें।
यह विडंबना ही तो है
बहुतायत में हम आप ही
अशांति फैलाते हैं,
जब खुद उस अशांति में झुलसते हैं
तब अनर्गल प्रलाप करते हैं।
अच्छा है सचेत रहें, सुरक्षित रहें
अशांति फैलाने वालों से
सावधान, सचेत ही न रहें,
उनका पुरजोर विरोध भी करें।
अशांति उन्मूलन की बात करें
ये तो अच्छी बात है मगर
पर अशांति की जो भेंट चढ़ गया
अशांति उन्मूलन का झुनझुना बजाकर
उसे वापस पा सकेंगे?
इस पर भी जरा विचार कीजिए
किसी के बहकावे में न आयें
राजनीति का शिकार होने से बचें
नेताओं के अपने नफा नुकसान हैं
तो आप भी अपने लिए
कम से कम नफा नहीं तो
होने वाले नुकसान का ही सोचें।
किसी के बरगलाने से हम आप
अशांति न फैलाएं, न ही फैलने दें
अपनी आंखों की पट्टी उतारकर
गंभीरता से अच्छा बुरा सोचें।
आज अशांति का झंडा उठायेंगे
कल उसी डंडे की चोट
अपनी पीठ पर पायेंगे,
फिर पछताएंगे, खुद को कोसेंगे।
और तो और फिर उसी भेड़चाल में
शामिल होने दौड़कर जायेंगे,
अशांति उन्मूलन का झंडा उठायेंगे
तब भी नुकसान अपना ही करेंगे।
अब ये हम सबको सोचना है
कि हमें शान्ति से जीना है,
या अशांति फैलाने में
पहले योगदान देना है,
फिर अशांति उन्मूलन का
बेसुरा संगीत गाना है।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921