कविता

जीवन सँवारे!

टपटप टपटप बूंदों का संगीत मधुरिम,
बरखा रानी बरसे छम छम, रिमझिम,
गीत मिलन के गुनगुनाये सजना मनमीत,
सावन की गुंजन से प्रकृति पुलकित।।1।।
कहे लहराती, बलखाती, अलबेली पवन,
खिला खिला हो पल्लवित जीवन चमन,
सुंदर सोच से महकती मस्त बहार हो,
सद्भावों से जीवन गुलशन गुलजार हो।।2।।
मानवता का हो पूजन, परोपकार धर्म हो,
जीव दया भाव पावन, सहिष्णुता सेवा हो,
पुनीत मानव जन्म मिला है सौभाग्य से,
धर्म, कर्म, कर्तव्य पालन हो दक्षता से।।3।।
नादानियां हमारी, लापरवाही न करे,
प्रदूषण मुक्त धरा-गगन, गलतियां सुधारे,
पर्यावरण मित्र बन, प्रकृति संरक्षण करे,
सहेजे प्राकृतिक संसाधन, जीवन सँवारे।।4।।
आओ संकल्प करें, न तोड़ेंगे वृक्ष, पर्वत,
जलधारा रहे निर्मल, हवा न हो प्रदूषित,
धुंआ, प्लास्टिक, न हो रासायनिक कचरा,
सहेजेंगे प्राकृतिक निर्मलता, प्रण हमारा।।
प्रदूषण से मुक्त हो हमारा पर्यावरण,
जिम्मेदारी से होगी समस्या निवारण,
सुंदर कल के लिए खूब पेड़ लगाओ,
शीतल छांव, शुद्ध प्राणवायु पाओ।।5।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८